अधिकांश राजनीतिक दल एवं उसके नेता अपने ही परिवार एवं सगे-सम्बन्धियों को राजनीति में लाने के लिए चुनाव के अवसर पर उम्मीदवार बनाते हैं। यही राजनीति में परिवारवाद है। हाल के दशकों में यह परम्परा बनी कि किसी प्रतिनिधि के निधन या इस्तीफे के कारण कोई सीट खाली होती है तो उसके किसी परिजन को चुनाव का टिकट दे दिया जाता है।
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2. बंधुआ मजदूर किसे कहते हैं? [2016A]
बंधुआ मजदूरी की प्रथा अत्यन्त प्राचीन है। बंधुआ मजदूर का अर्थ है एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति के लिए एक निश्चित अथवा अनिश्चित समय तक बिना मजदूरी के अथवा नाममात्र की मजदूरी के साथ काम करने के लिए बाध्य रहना अर्थात् जो मजदूर अपना श्रम किसी खास व्यक्ति या संस्था को उसी की शर्त पर बेचने के लिए बाध्य हो, बंधुआ मजदूर कहलाता है।
3. सत्ता की साझेदारी का क्या अर्थ है? [2016A1]
सत्ता में साझेदारी को लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक आवश्यक और महत्त्वपूर्ण आधार माना गया है। एक समय था जब किसी राज्य में राज्य सत्ता कुछ थोड़े-से लोगों के हाथों में रहती थी। नागरिकों द्वारा सरकारी काम-काज में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भाग लेने की क्रिया को सत्ता में साझेदारी की संज्ञा दी जाती है। सत्ता की साझेदारी की परिभाषा इस प्रकार दी जा सकती है- “किसी भी राज्य के नागरिकों द्वारा सरकारी स्तर पर निर्णय लेने या निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया को प्रभावित करना सत्ता में साझेदारी है।” मतदान में भाग लेना, किसी संस्था अथवा संगठन द्वारा निर्णय निर्माण की प्रक्रिया को प्रभावित करना सत्ता की साझेदारी के उदाहरण कहे जा सकते हैं।
4. किन्हीं दो प्रावधानों का जिक्र करें, जो भारत को धर्म निरपेक्ष देश बनाता है। [2011S, 2018AII]
वे दो प्रावधान निम्नांकित है, जिनसे ज्ञात होता है कि भारत एक धर्म निरपेक्ष देश है। (i) यहाँ राज्य का अपना कोई धर्म नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति को यह अधिकार है कि वह अपनी इच्छानुसार कोई भी धर्म अपना सकता है, इसमें राज्य हस्तक्षेप नहीं करेगा। राज्य धर्म के आधार पर नागरिक नागरिक के बीच किसी प्रकार का विर्भर नहीं करेगा। व्यक्ति चाहे किसी भी जाति, वंश, धर्म, लिंग, भाषा, सम्प्रदाय से सम्बन्धित क्यों न हो, पर उन्हें यह अधिकार है कि ये शिक्षा, खेल-कूद, मनोरंजन, एवं सांस्कृतिक गतिविधियों में समान रूप से भाग ले सकें। भारत विभिन्न धर्मावलंबियों का देश है। संविधान द्वारा यहाँ प्रत्येक व्यक्ति *को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है। अपने धर्म के अनुसार, पूजा की पद्धति अपनाने और अपनी धार्मिक संस्था के रख-रखाव का अधिकार दिया गया है। प्रत्येक धर्मावलंबी को अपने धर्म के प्रचार-प्रसार की इजाजत दी गई है। राज्य को धर्म के मामले में हस्तक्षेप या पक्षपात से अलग रखा गया है। राज्य को धर्म निरपेक्ष बनाया गया है। सही अर्थों में अपने धर्म को अन्य धमों से श्रेष्ठ मानने की धारणा साम्प्रदायिकता है।
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5.. साम्प्रदायिकता क्या है? [2019A1]
भारत में विभिन्न धमों के लोग निवास करते हैं। साम्प्रदायिक सद्भाव के लिए विभिन्न धमों जैसे हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई, पारसी लोगों के दिल में यह भावना होनी चाहिए कि हम सभी भारतवासी हैं। देश सर्वोपरि है और हम सब को मिल-जुलकर रहना है। पर्व त्योहार के अवसर पर भी हम दूसरे सम्प्रदाय के लोगों से मिलते रहें।
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6.साम्प्रदायिक सद्भाव को प्रोत्साहित करने के लिए आप क्या करेंगे?[2019AII]
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7. धर्मनिरपेक्ष राज्य का क्या अर्थ है?[2017Α, 2019AII]
भारतीय संविधान की प्रस्तावना के के आधार पर भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित किया गया है। इसका अर्थ है कि राज्य धर्म का विरोधी नहीं है। परन्तु, राज्य का अपना कोई धर्म भी नहीं है। राज्य सभी धर्मों को समान आदर और संरक्षण देता है तथा सभी धार्मिक समुदायों और वर्गों को एक समान धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करता है। धार्मिक विभेदों के बीच सामंजस्य, सहिष्णुता और सर्वधर्म समभाव की स्थापना के लिए ‘धर्मनिरपेक्षता’ की अवधारणा अपनाई जाती है।
8. लैंगिक विभेद या लैंगिक असमानता क्या है? [2016AII, 2021All
वास्तव में लिंग के आधार पर समाज दो भागों में बंटा है महिला एवं पुरुष। इन दोनों वर्गों में हमेशा असमानता बनी रहती है। जैविक दृष्टि से असमानता के परिणाम से स्त्रियाँ प्रताड़ित होती हैं। उनकी विभिन्न रूपों में प्रताड़ना का आधार सामाजिक विभेद की स्थितियाँ होती हैं। लिंग आधारित यह विभेद समाज में स्त्री शक्ति की उपेक्षा को प्रोत्साहित करता है। यह लैंगिक भेदभाव न केवल भारत में किया जाता है, बल्कि विश्व के प्रत्येक देश में कमोवेश यही स्थिति है। परन्तु, आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्रों में पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की भागीदारी में जमीन आसमान का अन्तर है। यही लैंगिक विभेद है, जो राष्ट्र के लिए एक गंभीर चुनौती है।
9. धर्मनिरपेक्षता से आप क्या समझते हैं? [2012A1, 2022A11)
(1) धर्मनिरपेक्ष राज्य किसी भी धर्म को राजकीय धर्म घोषित नहीं करेगा और न ही किसी धर्म को विशेष दर्जा देगा। (ii) धर्मनिरपेक्षता के अंतर्गत संविधान सभी नागरिकों को किसी भी धर्म का पालन करने एवं उसका प्रचार करने की आजादी देता है। ये दोनों प्रावधानों से स्पष्ट है कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है।
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10. सत्ता की साझेदारी लोकतंत्र में क्या महत्त्व रखती है? [2015A11, 2018A1, 2019, 2020A1, 2022A1]
सत्ता में साझेदारी की आवश्यकता लोकतंत्र की मजबूती, स्थिरता और इसके आधार को अधिक-से-अधिक व्यापक बनाने के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण हैं। यदि समाज के विभिन्न वगों को उचित सम्मान और प्रतिनिधित्व नहीं दिया जाए तो समाज में हिंसक संघर्ष या गृह युद्ध की स्थिति बन जाती है। यदि विभिन्न समूहों को उचित पहचान व सत्ता में साझेदारी नहीं मिलती है तो उनके असंतोष एवं संघर्ष से सामाजिक विभाजन, राजनैतिक अस्थिरता, सांस्कृतिक ठहराव व आर्थिक गतिरोध उत्पन्न होते हैं। उदाहरणस्वरूप बेल्जियम में विभिन्न भाषाई और जातीय समूहों के बीच पनपते टकराव को सत्ता में साझेदार बनाकर दूर किया। अतः लोकतंत्र की सफलता विभिन्न समूहों को शासन में साझीदार बनाने से संभव है।
11. सामाजिक विभाजन से आपका क्या अभिप्राय है? [2019A1,2023A1)
धर्म रंग, क्षेत्र आदि के आधार पर समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा परस्पर गलत व्यवहार करना, व उनके आपसी संघर्ष को सामाजिक विभाजन कहते हैं।
12. सांप्रदायिकता लोकतंत्र के लिए खतरा किस प्रकार है? [2024A1]
अपने धर्म को अन्य धमों से ऊँचा मानना और अपने धार्मिक हितों के लिए राष्ट्रहित का भी बलिदान कर देना साम्प्रदायिकता है। यह धर्म के नाम पर घृणा फैलाती है और मानव को मानव से घृणा करना सिखाती है। इसके चलते एक धर्म के अनुयायी दूसरे धर्म के अनुयायियों के दुश्मन हो जाते हैं। इससे समाज में हिंसात्मक विरोध शुरू हो जाते हैं। संबंधित समाज के रह रहे बहुसंख्यक लोगों द्वारा अल्पसंख्यक लोगों को धर्म के वर्चस्व को स्वीकार करने के लिए मजबूर कर दिया जाता है।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Type Questions)
1. सत्ता की साझेदारी के अलग-अलग तरीके क्या हैं? [2018All]
सत्ता की साझेदारी के अलग-अलग तरीके निम्नांकित प्रकार के है (1) सत्ता में साझेदारी के प्रश्न पर भाषा, धर्म, क्षेत्र और समुदायों के बीच भेदभाव समाप्त कर इस क्षेत्र में अवसर की समानता के सिद्धान्त को अपनाया गया है। (ii) सरकार के तीनों अंग-विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका के बीच सत्ता का विभाजन कर दिया गया है। इससे अधिक से अधिक लोगों की सता में साझेदारी सुनिश्चित होगी। (iii) केन्द्र एवं राज्यों की सरकारों के बीच सत्ता का विभाजन किया गया है। इस उद्देश्य से ही तीन सूचियाँ बनाई गई है संघ सूची, राज्य सूची एवं समवर्ती सूची।
2. लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ किस प्रकार अनेक प्रकार के सामाजिक विभाजनों को संभालती है? [2018C]
भारत में विभिन्न जाति, धर्म, भाषा, सम्प्रदाय एवं क्षेत्र के लोग निवास करते हैं और इस प्रकार उनमें विभेद बना रहता है। सत्ता में उचित साझेदारी इस विभेद को कम कर देती है और आपस में टकराव की संभावना भी कम हो जाती है। इसी उद्देश्य से भारत में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वगों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है। सरकार की नीतियों और कानूनों पर जनता का मत अवश्य लिया जाता है। इस प्रकार लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत सामाजिक विभाजन की प्रक्रिया सफलतापूर्वक सम्पन्न होती है।
3. भारत की विधायिकाओं में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की स्थिति क्या है? [2013A, 2018A1]
16वीं लोकसभा में पहली बार सर्वाधिक 65 महिलाएँ, निर्वाचित होकर आई और उनके प्रतिनिधित्व का प्रतिशत 11.97 हो गया है। 17वीं लोकसभा में इनकी संख्या बढ़कर 78 हो गई है। फिर भी इनकी स्थिति संतोषजनक नहीं कही जा सकती। भारत में तो विधायिकाओं में भी इनकी स्थिति विकसित देशों की तुलना में कम है। राज्य विधानसभाओं में उनके प्रतिनिधित्व का प्रतिशत इससे भी कम है। महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ना लोकतंत्र के लिए शुभ है।
4. साम्प्रदायिकता के किन्हीं चार कारणों को लिखें। [2019All]
साम्प्रदायिकता के चार कारण निम्नांकित है। (1) संकीर्ण धार्मिक विचारधारा। ( ii) अपने धर्म को अन्य धर्मों से अधिक श्रेष्ठ मानना। ( iii) अन्य धमों के प्रति घृणा फैलाना। ( iv) अपने धार्मिक हितों के लिए राष्ट्रहित को न समझना।
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5. जीवन के विभिन्न पहलुओं का जिक्र करें जिनमें भारत में स्त्रियों के साथ भेद-भाव है या वे कमजोर स्थिति में हैं। [2012A, 2020A1]
लड़के और लड़िकयों के पालन-पोषण के क्रम में ही लड़िकयों को गृहस्थी तक सीमित कर दिया जाता है। उनका काम खाना बनाना एवं बर्तन साफ करना माना जाता है। खान-पान, स्वास्थ्य, शिक्षा में लड़कों पर अधिक व्यय किया जाता है। लड़िकयों के प्रति उपेक्षा का दृष्टिकोण होता है। महिलाओं का कार्य घर के अंदर तक ही सीमित रहता है। भ्रूण जाँच कर लड़की की गर्भ में ही हत्या कर दी जाती है। महिलाएँ घरेलू कार्य में अतिरिक्त आमदनी के लिए कई कार्य करती भी हैं तो उसे महत्त्व नहीं दिया जाता। राजनीति में उनकी भूमिका नगण्य है। एक सर्वेक्षण के अनुसार एक औरत रोजाना 7% घंटे काम करती है जबकि पुरुष 6 घंटे। फिर भी औरतों के काम का महत्त्व नहीं होता। आज भी भारत के अनेक हिस्से में सिर्फ लड़के की चाह है। महिलाओं में साक्षरता की दर 54 प्रतिशत है जबकि पुरुषों में 74 प्रतिशत। लोकसभा में महिलाओं का प्रतिशत 11 के नीचे है।
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6. भारत में किस तरह जातिगत असमानताएँ जारी हैं? स्पष्ट करें। [2017Al, 2020A1]
भारतीय समाज में अभी भी जातिगत असमानताएँ विद्यमान हैं, इसके मुख्य कारण इस प्रकार है (1) प्रारंभ में जाति का आधार कर्म था, परन्तु जब से जाति का आधार जन्म हो गया, सामाजिक असमानताएँ जड़ जमाने में सफल हो गई। (ii) आज भी भारत में अस्पृश्यता का आचरण दिखाई देता हैं ऐसे समाचार पढ़ने को मिलते हैं कि दलित छात्रों के साथ विद्यालयों/छात्रावासों में दुर्व्यवहार किया गया। (iii) प्रत्येक जाति अपनी जातीय प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए जातीय संगठन को विकसित कर जातिगत असमानता बढ़ा रही है। जाति के आधार पर राजनीतिक दलों द्वारा टिकटों का बँटवारा किए जाने के कारण भी जातिगत असमानताएँ बनी हुई हैं।