दहेज प्रथा : एक अभिशाप

23. दहेज प्रथा : एक अभिशाप

विचार बिन्दु – 1. परंपरा और रूढ़ि, 2. भारतीय समाज की विडंबना, – 3. बढ़ती माँगे और नववधू पर अत्याचार, 4. दहेज विरोधी कानून, 5. कैसे – छुटकारा पाएँ।

परंपरा और रूढ़ि-दहेज प्रथा हमारे समाज की एक पुरानी परंपरा रही है। पहले

दहेज प्रथा : एक अभिशाप

विवाह के अवसर पर कन्या को स्नेहवश कुछ उपहार दिए जाते थे, जिन्हें स्वेच्छा और सामर्थ्य के अनुसार दिया जाता था। धीरे-धीरे यही परंपरा एक कठोर सामाजिक रूढ़ि में बदल गई। समय के साथ इसका रूप इतना बिगड़ गया कि विवाह जैसे पवित्र संबंध में प्रेम और सम्मान के स्थान पर लेन-देन और माँग का महत्त्व बढ़ गया। इस प्रकार दहेज

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की परंपरा आज एक गंभीर सामाजिक कुरीति बन गई है।

भारतीय समाज की विडंबना – भारतीय समाज में एक ओर नारी-सम्मान की बात की जाती है, तो दूसरी ओर दहेज जैसी कुप्रथा अब भी अनेक परिवारों में प्रचलित है। यह वास्तव में समाज की बड़ी विडंबना है। विवाह, जो दो परिवारों के बीच विश्वास और सम्मान का संबंध होना चाहिए, कई बार धन और वस्तुओं के आधार पर आँका जाने लगता है। इससे बेटियों को बोझ समझने की गलत भावना भी जन्म लेती है, जो समाज के लिए हानिकारक है।

बढ़ती माँगे और नववधू पर अत्याचार – दहेज की बढ़ती माँग इस समस्या

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को और गंभीर बना देती है। कई परिवार विवाह से पहले और बाद में धन, वाहन, आभूषण, फर्नीचर और अन्य वस्तुओं की माँग करते हैं। जब ये माँगें पूरी नहीं होतीं, तो कई बार नववधू को अपमान, तिरस्कार, मानसिक कष्ट और अत्याचार का सामना करना पड़ता है। इस कारण कन्या पक्ष के परिवार आर्थिक दबाव और चिंता से घिर जाते हैं। इसलिए दहेज प्रथा केवल एक बुरी परंपरा नहीं, बल्कि एक गंभीर

सामाजिक समस्या है

दहेज प्रथा : एक अभिशाप।

दहेज विरोधी कानून- दहेज प्रथा को रोकने के लिए कानून बनाए गए हैं। दहेज लेना और देना दोनों ही कानूनी दृष्टि से अपराध माने गए हैं। दहेज-निरोधक कानून का उद्देश्य महिलाओं की सुरक्षा करना और समाज को इस कुरीति से मुक्त करना है। लेकिन केवल कानून से यह समस्या दूर नहीं होगी। इसके साथ समाज में जागरूकता, नैतिकता और दृढ़ सामाजिक विरोध भी आवश्यक है।

कैसे छुटकारा पाएँ- दहेज प्रथा से छुटकारा पाने के लिए समाज को अपनी

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सोच बदलनी होगी। विवाह को सरल, सादगीपूर्ण और सम्मानजनक रूप में स्वीकार करना चाहिए। बेटियों की शिक्षा और आत्मनिर्भरता पर विशेष ध्यान देना चाहिए। युवाओं को स्वयं दहेज न लेने और न देने का संकल्प करना चाहिए। परिवार, विद्यालय, समाज और प्रशासन-सभी को मिलकर इसी कुरीति के विरुद्ध जागरूकता फैलानी चाहिए। जब समाज सामूहिक रूप से इसका विरोध करेगा, तभी इस अभिशाप से छुटकारा मिल सकेगा।

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