class 9 chapter 3 France ki kranti

France ki kranti

III. लघु उत्तरीय प्रश्न :

प्रश्न 1. फ्रांस की क्रांति के राजनीतिक कारण क्या थे ?
उत्तर— फ्रांस में राजतंत्रात्मक शासन था । लुई XVI के गद्दी पर बैठने के पहले फ्रांसीसी साम्राज्य की प्रतिष्ठा काफी बढ़ी चढ़ी थी। लेकिन यह नया शासक निरंकुश, फिजुलखर्च और भारी अयोग्य निकला । राज महल में रानी का खर्च भी बेशुमार था । कुछ अविजात वर्ग के लोग बिना काम-धाम किए बैठे-ठाले भी वेतन उठाते थे । सप्तवर्षीय युद्ध में अमेरिकियों की मदद में काफी खर्च हो चुका था । इसकी पूर्ति के लिए जनता पर कर थोपा गया, जिसका भारी विरोध हुआ । इस प्रकार राजा की निरंकुशता चरम पर थी। 175 वर्षों तक संसद की एक भी बैठक नहीं हुई । इससे जनता नाराज हो गई ।

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प्रश्न 2. फ्रांस की क्रांति के सामाजिक कारण क्या थे ?
उत्तर— फ्रांस का समाज तीन वर्गों में बँटा था। इन वर्गों को ‘एस्टेट’ कहा जाता : था । ‘एस्टेट’ तीन थे : ‘प्रथम एस्टेट में पादरी लोग आते थे। इनकी संख्या लगभग 1,30,000 थी । ‘दूसरे एस्टेट’ में कुलीन या अभिजात वर्ग के लोग थे। इनकी संख्या मात्र 40 लाख थी, जो 80 हजार परिवारों में बँटे थे । फ्रांस की कुल भूमि का लगभग 40 प्रतिशत भाग इन्हीं 40 लाख लोगों के अधिकार में था, जबकि ये राज्य को कोई कर भी नहीं देते थे । ‘तीसरे एस्टेट’ में देश के शेष लोग थे, जिनकी संख्या देश की कुल जनसंख्या का 90 प्रतिशत थी और जो सामान्यतः किसी-न-किसी छोटे-बड़े सेवा कार्य में लगे थे। इस वर्ग में कृषि मजदूर से लेकर जज तक आ जाते थे | सभी कर भी ये ही देते थे और सेना में भी इन्हीं को भर्ती होना पड़ता था । यह स्थित जनता के लिए असहनीय थी । इसी सामाजिक असमानता ने फ्रांस में क्रांति का मार्ग प्रशस्त कर दिया ।

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प्रश्न 3. फ्रांस की क्रांति के आर्थिक कारणों पर प्रकाश डालें ।
उत्तर—विदेशी युद्धों तथा राजघराने और सरकारी मुलाजिमों की फिजूलखर्ची ने फ्रांस की आर्थिक स्थिति डाँवाडोल कर दी थी। ठेकेदार लोग भूमिकर वसूलते थे, जिन्हें ‘टैक्स-फार्मर’ कहा जाता था । ये किसानों से मनमानाकर वसूलते थे और उसका एक नियत निश्चित भाग राजकोश में जमाकर शेष को अपने जेब में रख लिया करते थे । इस कारण वे धनी – से-धनी बनते जा रहे थे। किसानों को कष्टकर जीवन व्यतीत करना पड़ता था । आर्थिक रूप से वे कंगाल बने रहते थे। जैसा कि हम जानते हैं, फ्रांस की सम्पूर्ण जनसंख्या में गरीब किसानों की ही संख्या अधिक थी । केवल उन्हें राह दिखानेवालों की आवश्यकता थी, वरना ये पहले से ही राजा के विरुद्ध क्रांति के लिए तत्पर थे । नेताओं के प्रकाश में आते ही क्रांति का आरम्भ हो गयी और क्रांति ने सफलता भी प्राप्त कर ली ।

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प्रश्न 4. फ्रांस की क्रांति के बौद्धिक कारणों का उल्लेख करें ।
उत्तर—कहा जाता है कि फ्रांस की क्रांति वास्तव में मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों की क्रांति थी, जिनमें विचारक, चिंतक, लेखक, शिक्षक, प्रोफेसर, डॉक्टर, वकील जैसे लोग सम्मिलित थे । इस कारण इस क्रांति को बौद्धिक आंदोलन भी कहा गया है । लेखकों में प्रमुख थे ‘मांटेस्क्यू, वाल्टेयर और रूसो । मांटेस्क्यूं ने ‘विधि की आत्मा’ नाम से पुस्तक लिखी, जिसमें सरकार के तीनों अंगों विधायिका,

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कार्यपालिका तथा न्यायपालिका को अलग रखने की बात कही गई । इसी को पृथक्करण का सिद्धांत कहा गया । वाल्टेयर यद्यपि जनतंत्र में विश्वास नहीं रखता था, फिर भी उसने चर्च, समाज और राजतंत्र के दोषों का पर्दाफाश किया। वह चाहता था कि राजतंत्र रहे, लेकिन वह जनता के हित में काम करे। रूसो पूर्ण परिवर्तन का समर्थक था । उसने ‘सामाजिक संविदा’ नामक पुस्तक लिखी, जिसके माध्यम से उसने जनता को संप्रभू माना । दिदरो ने ‘ज्ञानकोष’ लिखा । क्वेजनो एवं तुर्गो जैसे अर्थशास्त्रियों ने आर्थिक शोषण की आलोचना की तथा मुक्त व्यापार का समर्थन किया । उद्योग-व्यापार में वह राज्य के हस्तक्षेप का विरोधी था । France ki kranti

प्रश्न 5. “ लैटर्स-डी- कैचेट” से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर- तत्कालीन फ्रांस में किसी प्रकार की स्वतंत्रता नहीं थी । जनता के हित की कोई भी बात बोलने की मनाही थी । भाषण, लेखन, विचार की अभिव्यक्ति, धार्मिक स्वतंत्रता आदि सभी पर प्रतिबंध था । राजा के मुँह से कोई भी निकली बात को ही कानून माना जाता था। कैथोलिक धर्म वहाँ का राजधर्म था। इस कारण प्रोटेस्टेंट धर्म माननेवालों. को सताया जाता था। राजा या तो स्वयं या अपने कारिन्दों से किसी को भी बिना कारण बताए गिरफ्तार कर या करवा सकता था । बिना अभियोग बताए ऐसे ही गिरफ्तारी वारंट को फ्रांस में लेटर्स-द-कैचेट (Lettes-de-cachet) कहा जाता था

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प्रश्न 6. अमेरिका के स्वतंत्रता संग्राम का फ्रांसीसी क्रांति पर क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर- अमेरिका के स्वतंत्रता संग्राम का फ्रांस की क्रांति पर यह प्रभाव पड़ा कि लिफायते के नेतृत्व में फ्रांसीसी सेना ने भी इंग्लैंड के विरुद्ध और अमेरिका के पक्ष में युद्ध किया था। जैसा कि हम जानते हैं कि सेना में तृतीय एस्टेट के लोगों को ही भर्ती किया जाता था । जब ये सैनिक फ्रांस लौटे तो अपने दिल में स्वतंत्रता का भाव भी लिए हुए थे । ये सैनिक आम जन को राजा के विरुद्ध लड़ने और स्वतंत्रता प्राप्त

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करने का प्रयास करने लगे । अमेरिका के गणतांत्रिक शासन ने फ्रांस के लिए प्रेरणा स्रोत का काम किया। फ्रांस की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी । इसका कारण अमेरीकियों की मदद में युद्ध करना भी था । अपनी आर्थिक स्थिति को संभालना फ्रांस के राजा के लिए कठिन हो गया । क्रांति पर इसका भी काफी प्रभाव पड़ा

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प्रश्न 7. ‘मानव और नागरिकों के अधिकार’ से आप क्या समझते हैं?
उत्तर— ‘मानव’ से तात्पर्य है विश्व का कोई भी व्यक्ति जबकि ‘नागरिक’ का अर्थ है देश विशेष में रहनेवाला उस राज्य का सदस्य । 27 अगस्त, 1789 में फ्रांस के नेशनल एसेम्बली ने जो अधिनियम बनाया, उसमें ‘मानव और नागरिकों के अधिकार’ (The Declaration of the rights of Man and Citizen) को स्वीकार कर लिया गया। इस अधिकार से व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का मार्ग प्रशस्त हो गया । प्रत्येक व्यक्ति को अपने विचार प्रकट करने, सभा करने, लिखने के साथ ही अपनी

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इच्छा के अनुसार धर्म पालन करने का अधिकार मिल गया। प्रेस स्वतंत्र हो गए । ‘लेटर्स-द-कैचेट’ निरर्थक हो गया । अब बिना कारण बताए किसी को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता था। किसी की जमीन सरकारी कार्य हेतु बिना वाजिब मुआवजा दिये नहीं ली जा सकती थी । कर का भार अब सब पर समान रूप से निश्चित किया गया। सभी को निजी सम्पत्ति रखने का अधिकार मिल गया ।

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प्रश्न 8. फ्रांस की क्रांति का इंग्लैंड पर क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर—फ्रांस की क्रांति का प्रभाव सिर्फ फ्रांस पर ही नहीं, बल्कि यूरोप के अन्य देशों पर भी पड़ा । प्रमुख प्रभावित होनेवाला देश इंग्लैंड था । इंग्लैंड ने ही नेपोलियन के विजय अभियान पर अंकुश लगाया था और उसे हराया था। फ्रांस की क्रांति के बाद इंग्लैंड की जनता सामंतों के विरुद्ध खड़ी हो गई । यही कारण था कि 1832 ई. में वहाँ ‘संसदीय सुधार अधिनियम’ पारित करना पड़ा । इस अधिनियम के लागू होने से जमींदारों की शक्ति लगभग समाप्त हो गई। यह जनता के लिए सुधारों का एक नया मार्ग साबित हुआ । आगे चलकर ब्रिटेन में जो औद्योगिक क्रांति हुई, उसमें फ्रांस की राज क्रांति का भी बड़ा हाथ था। औद्योगिक क्रांति के विकास में उस क्रांति ने काफी योगदान दिया ।

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प्रश्न 9. ” फ्रांस की क्रांति ने इटली को प्रभावित किया ।” कैसे ?
उत्तर- इटली एक ऐसा देश था, जो अनेक भागों में बँटा हुआ था । क्रांति के बाद नेपोलियन ने जो अपनी सेना का गठन किया उसमें सभी भागों के सैनिक लिए गए । नेपोलियन ने युद्ध की तैयारी कर पड़ोसी देशों पर हमला करने लगा और एक-एककर उन जीते गए देशों पर इटली का झंडा फहराने लगा । चूँकि सेना में इटली के सभी भागों के सैनिक थे, अतः इन अभियानों में उनमें आपसी एकता का सूत्रपात हुआ

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और इटली को संगठित रूप देने में सहायता मिली। फलतः ‘इटली राज्य’ की स्थापना हुई, जबकि इसके पहले एकता की भावना नहीं थी । सभी भागों के सैनिकों का एक साथ रहना, एक साथ लड़ना और सम्मिलित रूप से वियज प्राप्त करना — इन बातों से उनमें राष्ट्रीय एकता का विकास हुआ और आगे चलकर इटली के एकीकरण का मार्ग प्रशस्त हुआ।

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प्रश्न 10. फ्रांस की क्रांति से जर्मनी कैसे प्रभावित हुआ ?
उत्तर—फ्रांस की क्रांति के समय जर्मनी छोटे-छोटे तीन सौ राज्यों में बँटा हुआ था । क्रांति के पश्चात जब नेपोलियन का विजय अभियान शुरू हुआ तो उसने उन तीन सौ राज्यों को मात्र अड़तीस राज्यों में समेट लिया । फ्रांस की क्रांति के बाद वहाँ जो ‘स्वतंत्रता’, ‘समता’ एवं बंधुत्व की भावना का विकास हुआ था, उसे जर्मनी ने भी अपना लिया । जर्मनी में भी स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की भावना का तेजी से विकास हुआ | उनमें फ्रांस की देखा-देखी राष्ट्रीय भावना का भी विकास हुआ। राष्ट्रीय विकास की भावना के मजबूत होते ही जर्मनी का एकीकरण करना आसान हो गया ।

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IV. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न :

प्रश्न 1. फ्रांस की क्रांति के क्या कारण थे ?
उत्तर-फ्रांस की क्रांति के निम्नलिखित कारण थे :
(i) राजनीतिक कारण, (ii) सामाजिक कारण, (iii) आर्थिक कारण, (iv) सैनिक कारण, (v) व्यक्तिगत एवं धार्मिक कारण, (vi) बौद्धिक कारण इत्यादि, जिनका विस्तृत ब्योरा निम्नांकित है :

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(i) राजनीतिक कारण— सन् 1774 ई. में फ्रांस की गद्दी पर लुई XVIवाँ बैठा । यह अयोग्य, निरंकुश, फिजुलखर्च तथा महा अयोग्य शासक था। उसकी रानी अन्योयनेत फिजुलखर्च तो थी ही मूर्खतावस अपने आदमियों को राजदरबार में भर दिया और अपने मन का निर्णय करवाने लगी । गरीब जनता के दुःख-सुख से राजा-रानी किसी को भी मतलब नहीं था ।

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(ii) सामजिक कारण फ्रांसीसी समाज तीन भागों में बँटा था, जिन्हें एस्टेट (Estate) कहा जाता था । प्रथम एस्टेट में धार्मिक गुरु पादरी लोग थे । द्वितीय एस्टेट में कुलीन वर्गीय लोग थे, जिनमें अधिकतर दरबारी तथा राज कर्मचारी थे । तृतीय एस्टेट में बाकी बचे सभी लोग थे, जिनमें छोटे-बड़े व्यापारी व्यवसायी, शिक्षित वर्ग, किसान- मजदूर, शिल्पी आदि शामिल थे। करों का भार इन तृतीय एस्टटवालों पर ही था । कृषकों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी ।

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(iii) आर्थिक कारण – राजा-रानी की फिजुलखर्ची, अकारण विदेशी युद्ध में फँसने आदि से फ्रांस की आर्थिक स्थिति डगमगा गई थी । कर वसूलने का तरीका भी ऐसा था, जिससे वसूलनेवाले राज्य से अधिक लाभ में रहते थे । ठेकेदार, जिन्हें ‘टैक्स फार्मर’ कहा जाता था, रैयतों से मनमानी कर वसूलते थे, जिससे रैयत परेशान रहने लगे थे । राज्य भी लाभ से वंचित रहता था ।

(iv) सैनिक कारण सेना में तृतीय एस्टेट के लोग ही भर्ती किए जाते थे । कम वेतन के बावजूद कठोर अनुशासन और खराब भोजन के कारण सैनिक असंतुष्ट रहते थे। तृतीय एस्टेट के लोग सेना के निम्न पदों पर रहते थे, जबकि उच्च पदों पर कुलीन वर्ग के लोग रखे जाते थे । आर्थिक और सामाजिक असमानता के कारण सेना असंतुष्ट रहती थी । फल हुआ कि क्रांति में सेना ने खुलकर भाग लिया ।

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(v) व्यक्तिगत एवं धार्मिक कारण – फ्रांस की जनता को किसी प्रकार की स्वतंत्रता नहीं थी। लिखने, बोलने, विचार अभिव्यक्ति, धार्मिक स्वतंत्रता का पूर्णतः अभाव था । राजधर्म कैथोलिक था जबकि प्रोटेस्टेंटों को काफी सताया जाता था । राजा या उसका कोई करिन्दा बिना कारण बताए किसी को गिरफ्तार कर सकता था। देश में लगभग 400 कानून थे । गिरफ्तार व्यक्ति को इसका कुछ पता ही नहीं रहता था किस कानून के तहत उस पर मुकदमा चल रहा है ।

(vi) बौद्धिक कारण उपर्युक्त विकट स्थिति में कुछ ऐसे बुद्धिजीवियों का प्रादुर्भाव हुआ, जिन्होंने राजा और राजतंत्र का विरोध करने के लिए जनता को तैयार किया । इनमें प्रमुख थे— मांटेस्क्यू, वाल्टेयर और रूसो । मांटेस्क्यू ने ‘विधि की आत्मा’ नामक पुस्तक लिखी, जिसमें शक्ति के पृथक्करण पर जोर दिया गया था । वाल्टेयर ने चर्च, समाज और राजतंत्र के दोषों का पर्दाफाश किया। रूसो ने ‘सामाजिक संविदा’ लिखी, जिसमें प्रशासन में पूर्ण परिवर्तन की बात कही गई थी ।

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प्रश्न 2. फ्रांस की क्रांति के परिणामों का उल्लेख करें ।
उत्तर — फ्रांस की क्रांति के निम्नलिखित परिणाम हुए :

(i) पुरातन व्यवस्था का अंत तथा धर्म निरपेक्ष राज्य की स्थापना फ्रांस में क्रांति के बाद पहले से चली आ रही व्यवस्था का अंत हो गया और आधुनिक युग का जन्म हुआ। स्वतंत्रता, समानता तथा बंधुत्व की भावना को प्रोत्साहित किया गया जबकि सामंतवाद समाप्त हो गया । राज्य को धर्म में हस्तक्षेप करने से रोका गया अर्थात धर्म निरपेक्ष राज्य की स्थापना हुई । जनता को धार्मिक स्वतंत्रता प्राप्त हो गई।

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(ii) जनतंत्र की स्थापना तथा व्यक्ति की महत्ता राजा के दैवी अधिकार का सिद्धांत को गलत समझा गया। जनतंत्र की स्थापना हुई । नेशनल एसेम्बली ने व्यक्ति की महत्ता पर बल दिया। नागरिकों के मौलिक अधिकारों और कर्त्तव्यों की घोषण कर दी गई ।

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(iii) समाजवाद का आरम्भ फ्रांस की क्रांति ने समाजवादी प्रवृत्ति को जन्म दिया । न केवल फ्रांस में ही, बल्कि विश्व भर में इसे एक सिद्धांत के रूप में स्वीकारा गया। गैकोबिन्स ने साधारण जनता के अधिकारों की रक्षा तो की ही साथ ही अमीरों की जगह गरीबों का पक्ष लिया। जनता के राजनीतिक अधिकारों की घोषणा की गई ।

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(iv) वाणिज्य-व्यपार में वृद्धि गिल्ड प्रथा, प्रांतीय आयातकर तथा अन्य व्यपारिक प्रतिबंधों से व्यापारियों को मुक्त कर दिया गया। इससे वाणिज्य-व्यापार विकसित हुए । “यही कारण था कि उन्नीसवीं सदी में व्यापार के क्षेत्र में इंग्लैंड के बाद फ्रांस का ही स्थान था ।

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(v) दास प्रथा का उन्मूलन तथा शिक्षा का प्रसार क्रांति के बाद 1794 के कन्वेंशन में ‘दास मुक्ति कानून’ पारित किया गया, जिससे दास प्रथा उन्मूलित हो गई । लेकिन नेपोलियन द्वारा इसे समाप्त करने के बादजूद 1848 ने फ्रांसीसी उपनिवेशों ने दास प्रथा को अंतिम रूप से समाप्त कर दिया गया । क्रांति के पहले तक शिक्षा का प्रबंध चर्चों के हाथ में था । लेकिन क्रांति के बाद इसके प्रबंध का भार सरकार के जिम्मे आ गया ।

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(vi) महिलाओं को सुविधाओं की प्राप्ति फ्रांसीसी क्रांति में महिलाओं का भी हाथ था । ‘ओलम्ब द गूज’ नामक एक महिला के नेतृत्व में ‘दि सोसायटी ऑफ रिव्लूशनरी एण्ड रिपब्लिकन वोमेन’ नामक एक संस्था गठित हो गई । इस संस्था ने पुरुषों के समान ही महिलाओं के लिए भी राजनीतिक अधिकारों की माँग की, जिसे मान लिया गया । लेकिन उन्हें मताधिकार नहीं दिया गया । बहुत संघर्ष के बाद यह अधिकार उन्हें 1946 में प्राप्त हो सका। अब महिलाएँ भी पुरुषों के समान मतदान कर सकती हैं ।

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प्रश्न 3. ‘फ्रांस की क्रांति एक मध्यवर्गीय क्रांति थी । ” कैसे ?
उत्तर – यदि सही रूप से पूछा जाय तो यही कहना वाजिब होगा कि फ्रांस की क्रांति वास्तव में एक मध्यवर्गीय (बुर्जुआई) क्रांति थी । ऐसा सोच का कारण यह है कि इसे आरम्भ करनेवाले मध्यवर्गीय लोग ही थे तथा क्रांति की सफलता का लाभ भी इसी वर्ग को मिला । यद्यपि क्रांति में किसान और मजदूरों ने भी भाग लिया था। बल्कि जनशक्ति इन्हीं की अधिक थी । किन्तु इन्हें तो मताधिकार तक नहीं मिला। कुछ विद्वानों का यह कहना कि फ्रांसीसी क्रांति किसी एक वर्ग के हाथ से शासकीय अधिकार छिनकर किसी अन्य वर्ग के हाथ में सौंप देना भर था । यदि ऐसा नहीं होता तो इसकी नींव इतनी कच्ची नहीं रहती, जिससे कुछ वर्षों के अन्दर हीं नेपोलियन ने उन मध्यवर्गीय लोगों से प्रशासनिक अधिकार छिनकर अपने को सम्राट घोषित कर लिया। इससे सिद्ध होता है कि प्रशासन पर मध्यवर्ग का अभी अच्छी पकड़ नहीं बन पाई थी। लेकिन यह तो कहना ही पड़ेगा कि फ्रांसीसी क्रांति के सूत्रपात करनेवाले मध्यवर्गीय लोग ही थे और इसे सफलता तक पहुँचाने में भी इन्हीं लोगों का हाथ था । यद्यपि क्रांति के लिए जनशक्ति किसानों तथा मजदूरों से ही मिली थी, लेकिन जैसा किसी भी देश के जनआन्दोलनों के साथ होता है कि आन्दोलन की सफलता के लिए उनका या उनकी शक्ति का उपयोग किया जाता है लेकिन आन्दोलन की सफलता के बाद मुट्ठी भर नेता ही शासन में भाग लेते हैं और उसका भरपूर लाभ उठाते हैं । जनता को ‘मतदान’ नामक झुनझुना थमाकर बरगलाया जाता है कि असली शासन तो जनता के हाथ में है, जबकि यह सिर्फ कहने-सुनने की बात रहती है । सत्ता-सुख कुछ खास परिवार या गुट के लोग भोगते हैं और जनता ताकते रह जाती है। यही बात फ्रांस में भी हुई थी । मध्यवर्गीय लोग ही क्रांति में मुखर थे और क्रांति की सफलता के बाद शासन भी इन्हीं के हाथ आया । अतः यह कहना बिल्कुल सही है कि फ्रांस की क्रांति मध्यवर्गीय बुर्जुआ) क्रांति थी ।

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प्रश्न 4. फ्रांस की क्रांति में वहाँ के दार्शनिकों का क्या योगदान था ?
उत्तर- फ्रांसीसी क्रांति में वहाँ के दार्शनिकों का अहम योगदान था । दार्शनिकों में ही शिक्षित वर्ग, बुद्धिजीवी वर्ग, विचारक और लेखक आते हैं । इन्हीं लोगों ने फ्रांस की तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक दोषों के पर्दाफाश का काम किया । दार्शनिकों के प्रयास ने ही सामान्य जनमानस में आक्रोश पैदा किया । इसी कारण फ्रांस की क्रांति को बुद्धिजीवी आन्दोलन भी कहा गया। फ्रांसीसी बुद्धिजीवियों ने फ्रांस में बौद्धिक आन्दोलन का सूत्रपात किया । इन दार्शनिक बुद्धिजीवियों में प्रमुख थे मांटेस्क्यू, वाल्टेयर और रूसो । इनके लेखों ने जनमानव में क्रांति की चिन्गारी जला दी। मांटेस्क्यू ने विधि की आत्मा (The Spirit of Laws) लिखा, जिसमें इन्होंने सरकार के तीनों अंगों—व्यवस्थापिका, कार्यपालिका

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तथा न्यायपालिका को अलग-अलग स्वतंत्र रखने की दलील दी। इसी को शक्ति का पृथक्करण सिद्धांत कहा गया । वाल्टेयर ने चर्च, समाज और राजतंत्र के दोषों का पर्दाफाश किया । यद्यपि वाल्टेयर, जनतंत्र का विरोधी था फिर भी उसने प्रतिपादित किया कि राजतंत्र को प्रजा के हित में काम करना चाहिए। मांटेस्क्यू और वाल्टेयर केवल सुधार चाहते थे किन्तु रूसो ने इनसे कुछ कदम आगे बढ़कर राजतंत्र का विरोध और जनतंत्र का समर्थन किया । अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘सामाजिक संविदा’ (Social Contract) में इसने राज्य को व्यक्तियों द्वारा निर्मित संस्था बताया। राज्य पर केवल राजा के अधिकार का इसने खंडन किया और सिद्ध किया कि राज्य पर देश के सभी नागरिकों का अधिकार है। उसने जनता को ही संप्रभु माना । दिदरो ने वृहत ज्ञान कोष (Encyclopaedia) के लेखों में फ्रांस में क्रांतिकारी विचारों का प्रचार किया । क्वेजनो ( Quesney) तथा तुर्गे (Turgot) जैसे अर्थशास्त्रियों ने समाज में आर्थिक शोषण तथा आर्थिक नियंत्रण की आलोचना की । ये मुक्त व्यापार के समर्थक थे ।

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प्रश्न 5. फ्रांस की क्रांति की देनों का उल्लेख करें ।
उत्तर- फ्रांस की क्रांति की पहली देन तो यह है कि विश्व भर में यह राजतंत्र की समाप्ति का पहला बिगुल था । क्रांति के फलस्वरूप फ्रांस में तो राजतंत्र समाप्त हुआ ही, बाद में सारे विश्व ने इस मान्यता को मान लिया और धीरे-धीरे राजतंत्र सर्वत्र समाप्त हो गया । जहाँ राजा रह भी गए, वहाँ मात्र वे शोभा की वस्तु बनकर रह गए, क्योंकि राज्य के सारे अधिकार संसद के अधीन आ गए। स्वयं फ्रांस का राजा लूई XVI भी नाममात्र का ही राजा रह गया था। चर्च और पादरियों पर भी अंकुश लगा। कुछ देशा को छोड़ विश्व भर के राज्य धर्मनिरपेक्ष हुए और होते गए । फ्रांस के अतिरिक्त अन्य देश भी धीरे-धीरे ‘मानव और नागरिकों के अधिकार’ (The Declaration of the rights of Man and Citizen) को स्वीकार करने लगे।

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अब सब व्यक्ति अपने विचार व्यक्त करने के लिए स्वतंत्र हो गए। नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता भी मिली। इस स्वतंत्रता के तहत किसी देश का नागरिक कोई भी धर्म स्वीकार करने के लिए स्वतंत्र हो गया। इसके बीच न तो परिवार और न ही राज्य का कोई हस्तक्षेप रह गया। प्रेस भी स्वतंत्र होने लगे । अब राज्य किसी व्यक्ति को बिना कारण बताए गिरफ्तार नहीं कर सकता था। विश्व में जहाँ भी इस तरह की कोशिश हुई, उसको जनता का विरोध झेलना पड़ता था। धर्मनिरपेक्ष राज्यों के बनने के साथ ही सभी जगहों से प्राचीन व्यवस्थाओं का अंत हो गया। स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व (Liberty, Equality and Fraternity) को प्रोत्साहन मिलने लगा । सामंतवाद का अंत हो गया। जो देश भौगोलिक टुकड़ों में बँटकर अपनी-अपनी खिचड़ी अलग-अलग पका रहे थे, उनमें एकत्व का भाव बढ़ा और उनका तेजी से एकीकरण होने लगा ।

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प्रश्न 6. फ्रांस की क्रांति ने यूरोपीय देशों को किस तरह प्रभावित किया ?
उत्तर — फ्रांस की क्रांति ने यूरोप के अनेक देशों को अनेक तरह से प्रभावित किया, जिनका विवरण निम्नलिखित है

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(i) नेपोलियन का विजय अभियान यद्यपि क्रांति में नेपोलियन का कोई हाथ नहीं था, तथापि अपने विजय अभियनों के तहत जिन-जिन देशों में गया, सभी देशों की जनता ने उसका स्वागत किया और उसको क्रांति का अग्रदूत कहा। उसने उन राज्यों के नागरिकों को राष्ट्रीयता का पाठ पढ़ाया। फ्रांस की क्रांति का प्रभाव तत्काल रूप से जिन देशों पर पड़ा वे देश निम्नलिखित थे :

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(ii) इटली पर प्रभाव जैसाकि ऊपर बताया गया है, इटली उस समय कई भागों में बँटा हुआ था । फ्रांस की इस क्रांति के बाद इटली के विभिन्न भागों में नेपोलियन ने अपनी सेना एकत्रित कर युद्ध की तैयार की और उन छोटे-छोटे भागों का एकीकरण किया, जिसे इटली का एकीकरण कहा गया । इटली के सभी भागों के नागरिकों में राष्ट्रीयता की भावना आई ।

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(iii) जर्मनी पर प्रभाव जर्मनी इटली से भी अधिक भागों में विभक्त था । वह लगभग तीन सौ भागों में विभक्त था । नेपोलियन ने प्रयास पूर्वक तीन सौ को मात्र अड़तीस भागों में समेट लिया । फ्रांसीसी क्रांति से प्रभावित जर्मनी के सभी भागों में ‘स्वतंत्रता’, ‘समानता’ और ‘बंधुत्व’ की भावना का विकास हुआ। इसी का परिणाम था कि आगे चलकर जर्मनी का एकीकरण सम्भव हो सका

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(iv) पोलैंड पर प्रभाव फ्रांसीसी क्रांति का अग्रदूत कहे जानेवाले नेपोलियन ने पोलैंडवासियों में स्वतंत्रता की ललक पैदा कर दी । पोलैंड, रूस, प्रशा तथा आस्ट्रिया बीच बँटा हुआ था। अब वहाँ के लोग एक पोलैंड बनाने के लिए छटपटाने लगे । उनमें राष्ट्रीयता का संचार हो चुका था, जिसका फल हुआ कि प्रथम विश्व युद्ध के बाद पोलैंड एक स्वतंत्र राज्य के रूप में कायम हुआ । विश्व के सभी देशों ने उसे मान्यता दे दी ।

(v) इंग्लैंड पर प्रभाव — फ्रांसीसी क्रांति का प्रभाव इंग्लैंड पर भी पड़ा। वहाँ की जनता सामंतवाद के विरुद्ध आवाज उठाने लगी। इसका फल हुआ कि 1832 में इंग्लैंड को संसदीय सुधार अधिनियम पारित करना पड़ा । इस अधिनियम के पारित हो जाने से वहाँ के जमींदारों की शक्ति समाप्त हो गई। इससे आम जनता के लिए अनेक सुधारों का मार्ग प्रशस्त हो गया। इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति में भी फ्रांसीसी क्रांति का योगदान था

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प्रश्न 7. ‘फ्रांस की क्रांति एक युगान्तकारी घटना थी ।’ इस कथन की पुष्टि कीजिए ।
उत्तर—सन् 1789 की फ्रांसीसी क्रांति के फलस्वरूप एक युग का अंत हुआ एक नए युग का प्रारंभ हुआ । फलस्वरूप यह क्रांति एक युगांतकारी घटना मानी जाती है । इस क्रांति ने फ्रांस में राजतंत्र का खात्मा कर दिया और प्रजातंत्रीय शासन की स्थापना कर दी। सामाजिक व्यवस्था में भी बदलाव आए । ‘स्वतंत्रता’, ‘समानता’ एवं ‘बंधुत्व’ जैसे नये विचारों का प्रसार हुआ। साथ ही इस नए विचार को भी सिद्धान्त रूप में स्वीकार किया कि मनुष्य स्वतंत्र पैदा होता है और उसे आजीवन स्वतंत्र रहना चाहिए। यूरोप भर में पुरानी रीतियों और संस्थाओं को चुनौती दी जाने लगी । फ्रांसीसी क्रांति के फलस्वरूप ही पुनर्जागरण की लहर दौड़ी, जिससे विचार स्वतंत्र्य का प्रादुर्भाव यूरोप के लगभग सभी देशों में हुआ। वहाँ प्रायः सभी देशों में राष्ट्रवादी क्रांतियाँ होने लगीं। ये क्रांतियाँ सामंतवादी और निरंकुश शासन तथा शोषण करनेवाली सामाजिक व्यवस्था के विरोध के लिए हुईं। 1776 में आरंभ हुआ अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम, 1783 ई. में ब्रिटेन के विरुद्ध उसके उपनिवेशों की स्वाधीनता ने फ्रांस की पुरातन व्यवस्था को समाप्त कर स्वतंत्र विचारवाले समाज की स्थापना में काफी सहयोग दिया । यदि थोड़े में कहना पड़े तो हम कहेंगे कि फ्रांस की क्रांति ने आतंक के राज्य को समाप्त कर दिया। प्राचीन व्यवस्थाओं का अंत होकर सर्वत्र धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना होने लगी। राज्य को धर्म से अलग किया गया । नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता मिली । जनतंत्र का मार्ग प्रशस्त हुआ । व्यक्ति की महत्ता को स्वीकारा गया। समाजवाद को मानने का सभी देश नकल करने लगे, हालाँकि वे घोर पूँजीवादी थे। लेकिन समाजवादी कहलाने में वे भी गर्व का अनुभव करते थे । वाणिज्य-व्यापार की वृद्धि हुई । दास प्रथा समाप्त हो गई और शिक्षा का दायित्वं सरकार के कंधे पर आ गया। महिलाओं को भी मतदान का अधिकार मिला, लेकिन बहुत बाद में। इसके लिए महिलाओं को एक लम्बा संघर्ष करना पड़ा ।

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प्रश्न 8. फ्रांस की क्रांति के लिए लुई XVI किस तरह उत्तरदायी था
उत्तर— फ्रांस की क्रांति के लिए लुई XVI तो उत्तरदायी था ही, लेकिन उसके पूर्ववर्ती शासक भी कम जिम्मेदार नहीं थे। जिस समय लुई XVI गद्दी पर बैठा उस समय फ्रांस की प्रतिष्ठा काफी बढ़-चढ़ी थी । अयोग्यता तथा निरंकुशता पूर्ववर्ती राजाओं के समय से ही चली आ रही थी । लुई XIV का शासनकाल घोर निरंकुश था। इस बात का पत इससे चलता है कि उसका कहना था कि ‘मैं ही राज्य हूँ’ (I am the state) । फिर ऐसी बात भी नहीं है कि उसके समय में कोई विद्रोह नहीं हुए। लेकिन चूँकि वह एक योग्य शासक था, इसलिए विद्रोहों को दबा देने में सक्षम हो जाता था । उसी के समय से राज्य की पूरी शक्ति राजा में निहित रहने लगी। उसके समय में निरंकुशता का आलम तो यह था कि 1614 ई. के बाद 175 वर्षों तक वहाँ की संसदीय संस्था स्टेट्स जेनरल (State General) की एक भी बैठक नहीं हुई थी। राजा की निरंकुशता और स्वेच्छचारिता पर नियंत्रण के लिए वहाँ पार्लमा नामक संस्था थी, जिसकी संख्या 17 थी और जिसका गठन न्यायालय के रूप में किया गया था। इसके न्यायाधीशों का पद कुलीन वर्गों के लिए सुरक्षित था, जिसने बाद में वंशागत रूप धारणकर लिया था। राजा धन का लालच देकर अपनी बात मनवा लेता था ।

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लूई XVI 1774 में गद्दी पर बैठा और निरंकुशता उसे विरासत के रूप में मिली थी । लेकिन वह पहले के शासकों की अपेक्षा अधिक मूर्ख था । उसका विवाह आस्ट्रिया की राजकुमारी मेरी अन्तोयनेत के साथ हुआ था । इस विवाह में लूई XVI ने धन को पानी की तरह बहाया। फिर उसकी रानी भी मनमानी करती रहती थी। वह फिजुलखर्च तो थी ही, दरबार और सरकारी पदों से अपने आदमियों को भर दिया था और इन पर वह अनाप-शनाव व्यय करती थी । उसे लूई XVI अर्थात राजा की भी कोई परवाह नहीं थी। राजा तो फिजुलखर्च था ही रानी भी वैसी ही थी । फलतः राजकोष को खाली होना ही था । उसकी पूर्ति के लिए उसने जनता पर कर थोपा तो क्रांति आरंभ हो गई। इस प्रकार स्पष्ट है कि फ्रांस की क्रांति के लिए लूई XVI पूरी तरह से जिम्मेदार था !

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प्रश्न 9. फ्रांस की क्रांति में जैकोबिन दल की क्या भूमिका थी ?
उत्तर—सन् 1791 ई. में फ्रांस की नेशनल एसेम्बली ने संविधान का प्रारूप तैयार कर लिया, जिसमें शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत को अपनाया गया था। इस प्रकार फ्रांस में संवैधानिक राजतंत्र की स्थापना की गई थी। लूई XVI ने इसे मान भी लिया था किन्तु मिराव्यो की मृत्युं के बाद हिंसात्मक विद्रोह आरम्भ हो गया । विदेशी कुलीन वर्गों ने भी उस संविधान का विरोध किया। अप्रैल 1792 में नेशनल एसेम्बली ने आस्ट्रिया, प्रशा तथा सर्विया के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। इस युद्ध से जनता को काफी कठिनाई झेलनी पड़ी। उस समय तक सभी नागरिकों को वोट का अधिकार नहीं मिला था । एसेम्बली. का चुनाव भी अप्रत्यक्ष रूप से हुआ था । ये ही बातें आलोचना का विषय बन गईं आलोचकों में जैकोबिन क्लब के सदस्य प्रमुख थे। इसमें छोटे दुकानदार, कारीगर, घड़ीसाज, नौकर और दैनिक मजदूरी पर काम करनेले मजदूर आदि शामिल थे । जैकोबिन क्लब पेरिस के भूतपूर्व कान्वेंट ऑफ सेंट जेकर के नाम पर रखा गया । इसका नेता मैक्समिलियन रॉब्सपियर था ।

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रॉब्सपियर वामपंथी विचारधारा का व्यक्ति था । इसी कारण खाद्यान्न की महँगाई और अभाव के कारण उसने हिंसक विद्रोह की शुरुआत कर दी। उसने आतंक का राज्य स्थापित कर दिया। चौदह महीनों के अन्दर लगभग सतरह हजर व्यक्तियों पर मुकदमा चलाए गए और उन्हें फाँसी दे दी गई। रॉब्सपियर प्रत्यक्ष प्रजातंत्र चाहता था। 21 वर्ष या इससे अधिक आयु के सभी लोगों को उसने वोट का अधिकार देदिया। इस आधार पर एसेम्बली को कन्वेंशन नाम दिया गया तथा राजा की सत्ता को पूर्णतः समाप्त कर दिया गया । देशद्रोह के अभियोग में राजा और रानी दोनों पर मुकदमा चलाया गया और उन्हें फाँसी दे दी गई। लेकिन रॉब्सपियर के आतंक के विरुद्ध भी आन्दोलन हुए और 1794 में उसे भी फाँसी दे दी गई। इस प्रकार हम देखते हैं कि फ्रांस की क्रांति में जैकोबिन दल की भूमिका तो सुधारात्मक रही लेकिन वह स्थायी नहीं रह सकी ।

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प्रश्न 10. नेशनल ऐसेम्बली और नेशनल कान्वेंशन ने फ्रांस में कौन-कौन-से सुधार कानून पारित किये ?sxsxsxsxsxsx
उत्तर—बैस्टिल दुर्ग को एक जेल के रूप में व्यवहार किया जाता था । वहाँ अनेक क्रांति के नेता बंदी बनाए गए थे। 14 जुलाई, 1789 में बैस्टिल दुर्ग को क्रांतिकारियों ने तोड़ दिया और क्रांतिकारी बंदियों को छुड़ा लिए। यह राजतंत्र की समाप्ति के रूप में देखा गया। राजा लुई XVI ने भी इसे मान लिया । वह नाममात्र का राजा बना रहा और नेशनल ऐसेम्बली में क्रांतिकारियों का वर्चस्व बढ़ गया । यह एसेम्बली एक नए फ्रांस के लिए कानून बनाने लगी। इस एसेम्बली ने 27 अगस्त, 1789 को मानव और नागरिकों के अधिकार (The Declaration of the rights of Man and Citizen) को स्वीकारा गया । इस कानून से देश के प्रत्येक व्यक्ति को अपने विचार प्रकट करने और अपने मन के अनुसार धर्म पालन का अधिकार मिल गया । अर्थात एक धर्म निरपेक्ष राज्य की स्थापना की गई । व्यक्तिक स्वतंत्रता तो मिली ही साथ ही प्रेस और भाषण की स्वतंत्रता को भी प्रश्रय दिया गया। अब राज्य, राजा या उसका कारिन्दा बिना कारण बताए किसी को गिरफ्तार नहीं कर सकता था । राजकीय आवश्यकता के लिए यदि जमीन की आवश्यकता पड़े तो जमीनवाले को बिना वाजिब मुआवजा दिए सरकार जमीन नहीं ले सकती थी । कर का भार सभी पर समान रूप से डाला गया। अब देश के सभी नागरिकों को संपत्ति रखने का अधिकार मिल गया । 1791 में ही नेशनल एसेम्बली ने संविधान का प्रारूप तैयार कर लिया, जिसमें शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत को अपनाया गया ।. नेशनल एसेम्बली का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से कराया गया था। इस कारण इसकी आलोचना होने लगी । आलोचकों में ‘जैकोबिन’ दल के सदस्य तथा सर्वहारा वर्ग के लोग अधिक थे। यह क्लब पेरिस के रॉब्सपियर इस दल का नेता था । उसने नेशनल एसेम्बली के स्थान पर नेशनल कन्वेंशन की स्थापना की और यही कन्वेंशन कानून बनाने लगा । इसने बालिग मताधिकार का प्रावधान किया । मतदाता बनने में धन से कोई मतलब नहीं रखा गया। इसने राजा की सत्ता को पूर्णतः समाप्त कर दिया। इतना ही नहीं, इसने लुई XVI तथा उसकी रानी मेरी अन्तोयनेत — दोनों को फाँसी पर चढ़ा दिया । कन्वेंशन ने फ्रेंच भाषा को राष्ट्रभाषा घोषित किया । उपनिवेशों में गुलाम भेजने की प्रथा भी समाप्त कर दी गई। इस मान्यता को भी रद्द कर दिया गया कि प्रथम पुत्र ही जायज उत्तराधिकारी होगा । इन सुधार कार्रवाइयों के बावजूद चूँकि रॉब्सपियर हिंसा में विश्वास करता था, अतः जनता ने उसे नकार दिया और उसे मार डाला गया।

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