विद्याधनं सर्वेषु धनेषु प्रधानं अस्ति। विद्यायाः देशे विदेशे च समादरं भवति। विद्याधनं दानेन वर्धते। संचयेन च क्षयं गच्छति। इदं धनं चौरः अपि न चोरयितुं समर्थः भवति। विद्या मनुष्याणाम् सर्वाम् आवश्यकतां पूरयितुं समर्था अस्ति। इयम् सर्वांगीण विकासस्य सम्पादिका अस्ति। अतएव सत्यमेव कथ्यते विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्।
ज्ञान का धन सभी धनों में सबसे बड़ा है। ज्ञान का देश और विदेश में सम्मान होता है। ज्ञान का धन दान से बढ़ता है और जमा करने से कम होता है। चोर भी इस धन को चुरा नहीं सकता। ज्ञान इंसान की सभी ज़रूरतों को पूरा करने में सक्षम है। वह बड़े विकास का एडिटर है। इसीलिए सच में कहा गया है कि ज्ञान का धन सभी धनों में सबसे बड़ा है।