राजनीति और भ्रष्टाचार

राजनीति और भ्रष्टाचार
विचार बिन्दु – 1. प्राचीन स्वरूप, 2. वर्तमान स्थिति, 3. सत्ता लोलुपता, 4. भ्रष्ट आचरण का बोलबाला, 5. समाधान के उपाय, 6. उपसंहार।
प्राचीन स्वरूप-प्राचीन काल में राजनीति का मुख्य उद्देश्य जनकल्याण, न्याय और व्यवस्था की स्थापना माना जाता था। आदर्श शासन व्यवस्था में शासक जनता की भलाई को सर्वोपरि मानता था। इसलिए राजनीति को सेवा, उत्तरदायित्व और नैतिकता से जोड़ा जाता था।
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वर्तमान स्थिति-वर्तमान समय में राजनीति का स्वरूप कई स्थानों पर बदलता दिखाई देता है। सिद्धांत और आदशों के स्थान पर कहीं-कहीं स्वार्थ, अवसरवाद और अनुचित प्रभाव का प्रवेश हो गया है। यही स्थिति भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है। जब सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता और ईमानदारी कम होती है, तब प्रशासनिक व्यवस्था भी प्रभावित होती है।
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सत्ता लोलुपता-भ्रष्टाचार का एक प्रमुख कारण पद और शक्ति के प्रति अत्यधिक आकर्षण है। जब राजनीति सेवा के स्थान पर स्वार्थ की ओर झुकने लगती है, तब अनुचित साधनों का प्रयोग बढ़ जाता है। इससे जनहित की अपेक्षा व्यक्तिगत लाभ को अधिक महत्त्व मिलने लगता है।
भ्रष्ट आचरण का बोलबाला – भ्रष्ट आचरण समाज और राष्ट्र दोनों के लिए
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हानिकारक है। इससे रिश्वत, पक्षपात, संसाधनों का दुरुपयोग और नैतिक मूल्यों का ह्रास होता है। ऐसी स्थिति में जनता का विश्वास कमजोर पड़ता है और विकास
की गति भी प्रभावित होती है।
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समाधान के उपाय-इस समस्या के समाधान के लिए नैतिक शिक्षा, पारदर्शिता, कठोर प्रशासन, जागरूक नागरिकता और उत्तरदायी नेतृत्व आवश्यक है। जब राजनीति जनसेवा का माध्यम बनेगी और ईमानदारी को महत्त्व मिलेगा, तभी भ्रष्टाचार पर प्रभावी नियंत्रण संभव होगा।
उपसंहार-राजनीति समाज निर्माण का एक महत्त्वपूर्ण साधन है, इसलिए इसे स्वच्छ, उत्तरदायी और जनहितकारी होना चाहिए। भ्रष्टाचार लोकतंत्र को कमजोर करता है, जबकि ईमानदार राजनीति राष्ट्र को सशक्त बनाती है। अतः सभी को मिलकर स्वच्छ सार्वजनिक जीवन की स्थापना का प्रयास करना चाहिए।
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