मेरे प्रिय कवि सूरदास

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 मेरे प्रिय कवि सूरदास

 

विचार बिंदु – 1. जीवन परिचय, 2. साहित्यिक परिचय, में महत्त्वपूर्ण स्थान, 4. उपसंहार।
3. हिन्दी साहित्य
जीवन परिचय-  जीवन परिचय-हिन्दी साहित्य में भक्तिकाल की सगुण भक्ति धारा के प्रमुख कवियों में सूरदास का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है। सूरदास के काव्य का मुख्य स्वर भक्ति है। उनके पदों में श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम, समर्पण और भावुकता की अभिव्यक्ति है। उनकी रचनाओं में कृष्ण की बाललीलाओं, रासलीलाओं और गोपियों के प्रति उनके प्रेम का सुंदर वर्णन मिलता है। सूरदास ने अपने काव्य में मानवीय भावनाओं को अत्यंत गहराई और सजीवता से चित्रित किया है। इसलिए सूरदास मेरे सबसे प्रिय कवि है।
साहित्यिक परिचय, में महत्त्वपूर्ण स्थान, – महाकवि सूरदास का जन्म 15वीं शताब्दी के मध्य ब्रजमंडल में 1478 ई० के आसपास हुआ था। इनके जन्म के स्थान व जन्मतिथि के संदर्भ में विद्वान एक मत नहीं है परंतु अधिकांश लोगों का मानना है कि इनका जन्म रुनकता या सीही नामक स्थान पर हुआ था। ये मथुरा और वृंदावन के बीच गऊघाट पर निवास करते थे और श्रीनाथजी के मंदिर में भक्तिभाव से विनय पद गाते थे। महाकवि सूरदास महाप्रभु वल्लभाचार्य के शिष्य थे।
3. हिन्दी साहित्य – साहित्यिक परिचय-सूरदास वात्सल्य और प्रेम के अद्वितीय कवि माने-जाते हैं। उनकी तीन प्रमुख रचनाएँ हैं- सूरसारावली, साहित्य लहरी, व सूरसागर। ‘सूरसागर’ महाकवि सूरदास की अक्षयकृति का आधार है। उन्होंने अपनी अनूपम रचना सूरसागर में भगवान कृष्ण के बाल-रूप, सखा-रूप वे प्रेमीरूप का अत्यंत सूक्ष्म, सुंदर व सजीव वर्णन किया है। उन्हें स्वयं ‘महाप्रभु वल्लभाचार्य’ ने ‘पुस्टिमार्ग
का जहाज’ कहा था। हिन्दी साहित्य में महत्त्वपूर्ण स्थान महाकवि सूरदास का हिन्दी साहित्य में
बेहद ऊँचा और महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। उनके साहित्यिक योगदान ने हिन्दी भक्ति काव्य को अत्यंत समृद्ध किया। भक्तिकाल को हिन्दी साहित्य के स्वर्णिम युगों में गिना जाता है। सूरदास के काव्य में भक्ति प्रेम और भक्ति मार्ग की सजीव झलक मिलती है। उनके काव्य ने उस समय के समाज को धार्मिक और अध्यात्मिक दृष्टिकोण से गहरा प्रभावित किया।
उपसंहार-महाकवि सूरदास ‘अष्टछाप’ के सर्वाधिक लोकप्रिय कवियों में से एक माने जाते हैं। कृष्ण काव्यधारा के प्रवर्तक कवि सूरदास ने अपना संपूर्ण जीवन श्रीकृष्ण की भक्ति के लिए समर्पित कर दिया था। वही अपने आराध्य ‘श्रीकृष्ण’ के बाल्यकाल का वर्णन करते हुए ऐसा प्रतीत होता है, जैसे वह मानो उनके बाल्यकाल का कोना-कोना झाँक आए हो। सूरदास के पदों में कृष्ण-भक्ति, वात्सल्य और प्रेम का अत्यंत सुंदर तथा प्रभावशाली चित्रण मिलता है।

 

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