भूमिका-पुस्तकें मानव की सबसे अच्छी दोस्त होती है जो बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक उसका सहारा होती है। पुस्तकों के कारण ही आज शिक्षा पद्धति सुदृढ़ हो पाई है। लोगों में ज्ञान और अनुभव का विस्तार हुआ है। किसी भी व्यक्ति के लिए यह संभव नहीं कि हर तरह के पुस्तकों का संग्रह कर रख सके। अंत ज्ञान की गंगा सबके लिए सुलभ हो सके परंपरा की चिन्तन-सम्पदा हस्तगत हो सके, इसके लिए पुस्तकालय की आवश्यकता महसूस हुई। पुस्तकालय का अर्थ होता है- पुस्तकों का घर। यहाँ ज्ञान-विज्ञान, साहित्य, इतिहास, समाज और अन्य विषयों की अलग-अलग भाषाओं में पुस्तकों का संग्रह होता है। जिसका उपयोग हम आगे आने वाले जीवन को बेहतर बनाने के लिए कर सकते हैं।
पुस्तकालय पर निबंध
महत्त्व-पुस्तकालय का महत्त्व मानव जीवन में प्राचीन काल से रही है। यहाँ विविध प्रकार के ज्ञान और विचारों का संग्रह होता है। किसी प्राचीन विषय का अध्ययन करना हो या वर्त्तमान विषय का, विज्ञान और तकनीकी का अध्ययन करना हो या किसी कला या साहित्य का कविताओं की कोई अच्छी पुस्तक चाहिए या किसी महापुरुष की जीवनी सब कुछ एक स्थान यानी पुस्तकालय में हमें मिल जाती है। पुस्तकालय हमारे विद्यार्थी जीवन में बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इनके माध्यम से हमें देश-विदेश के महान लेखकों की लिखी हुई पुस्तकें पढ़ने का अवसर मिल जाता है। विद्यार्थी यहाँ पर आकर आराम से शांति माहौल में पुस्तके पढ़ सकता है और अपने ज्ञान के जिज्ञासा को शांत कर सकता है।
उपयोगिता-पुस्तकालय ज्ञान का असीम भंडार है। यह एक ऐसा स्थान है, जहाँ से ज्ञान की धारा निरंतर प्राप्त होती रहती है। पुस्तकालय हमें प्राचीनकाल से लेकर वर्त्तमान काल के विचारों से अवगत कराती है। कोई व्यक्ति एक सीमा तक ही पुस्तकें खरीद सकता है। सभी प्रकाशित पुस्तकें खरीदना सबके बस की बात नहीं। जो भी शिक्षा और ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं, उनके लिए पुस्तकालय एक सच्चे मित्र के समान है। इसलिए पुस्तकालय की उपयोगिता सदैव बनी रहेगी।
हानि-पुस्तकालयों से हानियाँ भी होती है, यह सर्वथा असंगत होगा, किन्तु कुछ लोग अच्छी वस्तु का दुरुपयोग करके उसे हानिकारक बना देते हैं। इसी प्रकार कुछ विद्यार्थी पुस्तकालय में जाकर मनोरंजन या कहानियाँ पढ़ते रहते हैं और अपनी पाठ्य – पुस्तकों की उपेक्षा कर देते हैं। जिसका परिणाम उनके लिए हानिकारक होता है। पुस्तकालय में अक्सर देखा गया है कि कुछ लोग अच्छी-अच्छी पुस्तकों को चुरा लेते हैं या उसका पेज फाड़ लेते हैं। ऐसे में वे न सिर्फ दूसरों का नुकसान करते हैं बल्कि खुद का भी नुकसान करते हैं। इसमें पुस्तकालय का कोई दोष नहीं है, वे ज्ञान के भंडार हैं और हमें सीखने का अवसर प्रदान करते हैं।
निष्कर्ष-पुस्तकालय वास्तव में ज्ञान का असीम भंडार है। देश की जनता के लिए यह ज्ञान और उन्नति का एक महत्त्वपूर्ण साधन है। भारत वर्ष में अच्छे पुस्तकालयों की संख्या पर्याप्त नहीं है। इस दिशा में निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। वास्तव में पुस्तकें मनुष्य की सच्ची मित्र और जीवन-पथ की मार्गदशक होती हैं।