कारकार्थ-निरूपण: संस्कृत व्याकरण नोट्स | Sanskrit Karak Notes class 10th
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Sanskrit Karak Notes class 10th
संस्कृत व्याकरण में क्रिया को सिद्ध करने में जो सहायक होते हैं, उन्हें कारक कहते हैं। पाणिनी व्याकरण के अनुसार मुख्य रूप से 6 कारक माने जाते हैं—कर्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान और अधिकरण। (सम्बन्ध और सम्बोधन को कारक नहीं माना जाता, लेकिन विभक्ति इनके साथ प्रयुक्त होती है)। विभक्तियों की संख्या कुल 7 होती है।
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1. प्रथमा विभक्ति (कर्ता कारक)
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2. द्वितीया विभक्ति (कर्म कारक)
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3. तृतीया विभक्ति (करण कारक)
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4. चतुर्थी विभक्ति (सम्प्रदान कारक)
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5. पञ्चमी विभक्ति (अपादान कारक)
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6. षष्ठी विभक्ति (सम्बन्ध कारक)
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7. सप्तमी विभक्ति (अधिकरण कारक)
कर्त्ता–क्रिया के संपादन में जिसकी स्वतंत्रता विवक्षित हो (जो मुख्य रूप से स्वतंत्र हो), उसे कर्त्ता कारक कहते हैं और इसमें प्रथमा विभक्ति होती है।
उदाहरण:
रामः पठति (राम पढ़ता है)।
बालकः पठति (बालक पढ़ता है
1-कर्त्तरि प्रथमा (उक्ते कर्त्तरि प्रथमा)
कर्तृवाच्य के अनुक्त (कथित) कर्त्ता में प्रथमा विभक्ति होती है।
उदाहरण:
मोहनः धावति,
देवदत्तः हँसति।
बालकः पठति (बालक पढ़ता है
2-सम्बोधने च
सम्बोधन कारक में प्रथमा विभक्ति होती है।
उदाहरण: हे बालक! अत्र आगच्छ! (हे बालक! यहाँ आओ!)।
3-उक्ते कर्मणि प्रथमा
कर्मवाच्य में जहाँ कर्म की प्रधानता होती है (उक्त कर्म), उसमें प्रथमा विभक्ति होती है।
उदाहरण: बालकेन चन्द्रः दृश्यते (यहाँ ‘चन्द्रः’ उक्त कर्म है)।
द्वितीया विभक्ति (कर्म कारक)
1-कर्तुरीप्सिततमं कर्म
नियम: कर्ता अपनी क्रिया के द्वारा जिस पदार्थ को सबसे अधिक प्राप्त करना चाहता है, उस अत्यंत ईप्सित (इच्छित) कारक को कर्म कहते हैं तथा कर्म में द्वितीया विभक्ति होती है।
उदाहरण:
देवदत्तः संस्कृतं पठति,
रामः आम्रं खादति।
2-अभिनिविशश्च
अभि’ तथा ‘नि’ उपसर्गपूर्वक ‘विश्’ धातु के आधार (स्थान) की कर्म संज्ञा होती है और उसमें द्वितीया विभक्ति होती है।
उदाहरण: सन्मार्गम् अभिनिविशते।
3-उपअनुअधिआङ् वसः
उप, अनु, अधि, आङ् (आ) उपसर्गपूर्वक ‘वस्’ धातु के आधार में द्वितीया विभक्ति होती है।
उदाहरण: विष्णुः वैकुण्ठम् अधिवसति / उपवसति / आवसति।
4-कालाध्वनोः अत्यन्तसंयोगे
जब कोई क्रिया निरंतर होती रहे, तो कालवाची (समय) और मार्गवाची (दूरी) शब्दों के योग में अत्यंत संयोग होने पर द्वितीया विभक्ति होती है।
उदाहरण:
मासं व्याकरणम् अधीते (कालवाची – महीने भर लगातार पढ़ा)
क्रोशं कुटिला नदी (मार्गवाची – कोस भर नदी टेढ़ी है)
5-क्रियाविशेषणे द्वितीया
क्रिया की विशेषता बतलाने वाले शब्दों (क्रियाविशेषण) में द्वितीया विभक्ति होती है।
उदाहरण:
सः मन्दं-मन्दं धावति,
गीता मधुरं गायति।
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तृतीया विभक्ति (करण कारक)
1-साधकतमं करणम्
क्रिया की सिद्धि में जो सबसे अधिक सहायक (उपकारक) होता है, उसे करण कारक कहते हैं तथा इसमें तृतीया विभक्ति होती है।
उदाहरण:
कृषकः हलेन क्षेत्रं कर्षति (किसान हल से खेत जोतता है)।
2-कर्तृकरणयोस्तृतीया
: कर्मवाच्य एवं भाववाच्य के अनुक्त कर्ता में तथा करण कारक में तृतीया विभक्ति होती है।
उदाहरण:
मया गृहं गम्यते (कर्मवाच्य),
तेन हस्यते (भाववाच्य),
सः कलमेन लिखति (करण)।
3-इत्थंभूतलक्षणे
जिस लक्षण (चिह्न) से किसी व्यक्ति या वस्तु की पहचान या ज्ञान हो, उस लक्षणवाचक शब्द में तृतीया विभक्ति होती है।
उदाहरण: सः जटाभिः तापसः (वह जटाओं से तपस्वी प्रतीत होता है)।
4-येनाङ्गविकारः
जिस अंग (शरीर के अवयव) के द्वारा शरीर में कोई विकार (दोष) लक्षित हो, उस अंगवाचक शब्द में तृतीया विभक्ति होती है।
उदाहरण:
सः अक्षणा काणः (वह आँख से काना है), सः पादेन खञ्जः।
5-सहयुक्तेऽप्रधाने
सह, साकम्, सार्धम्, समम् आदि शब्दों के योग में अप्रधान (साथ जाने वाले) कर्ता में तृतीया विभक्ति होती है।
उदाहरण:
पुत्रेण सह पिता आगतः (पुत्र के साथ पिता आए)।
चतुर्थी विभक्ति (सम्प्रदान कारक)
1-कर्मणा यमभिमैति स सम्प्रदानम्
दान क्रिया के द्वारा जिसे अभिप्राय (लक्ष्य) सिद्ध किया जाए, उसकी सम्प्रदान संज्ञा होती है तथा उसमें चतुर्थी विभक्ति होती है।
उदाहरण:
राजा दरिद्राय धनं ददाति (राजा दरिद्र को धन देता है)।
2-रुचार्थानां प्रीयमाणः
रुचि (अच्छा लगना) अर्थ वाली धातुओं के प्रयोग में प्रसन्न होने वाले व्यक्ति (प्रीयमाण) की सम्प्रदान संज्ञा होती है और उसमें चतुर्थी विभक्ति होती है।
उदाहरण: हरये रोचते भक्तिः (हरि को भक्ति अच्छी लगती है)।
3-धारेरुत्तमर्णः
‘धृ’ धातु (कर्ज देने के अर्थ में) के प्रयोग में उत्तमर्ण (महाजन या कर्ज देने वाला) की सम्प्रदान संज्ञा होती है और चतुर्थी विभक्ति होती है।
उदाहरण: भक्ताय धारयति मोक्षम्।
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4-नमःस्वस्तिस्वाहास्वधाऽलम्
नमः, स्वस्ति, स्वाहा, स्वधा, अलम् और वषट् शब्दों के योग में चतुर्थी विभक्ति होती है।
उदाहरण:
गणेशाय नमः
प्रजाभ्यः स्वस्ति
अग्नये स्वाहा
पञ्चमी विभक्ति (अपादान कारक)
1-ध्रुवमपायऽपादानम्
अपाय (अलग होने) के अर्थ में जो वस्तु स्थिर (ध्रुव) रहती है, उस स्थिर वस्तु की अपादान संज्ञा होती है तथा उसमें पञ्चमी विभक्ति होती है।
उदाहरण: वृक्षात् पत्राणि पतन्ति (पेड़ से पत्ते गिरते हैं)।
2-भीत्रार्थानां भयहेतुः
भयार्थक (डरने वाली) और रक्षार्थक (रक्षा करने वाली) धातुओं के प्रयोग में जिससे भय हो, उस हेतुकारक की अपादान संज्ञा होती है और पञ्चमी विभक्ति होती है।
उदाहरण: सः चौरात् बिभेति (वह चोर से डरता है)।
3-आख्यातोपयोगे पञ्चमी
नियमपूर्वक विद्या अध्ययन करने पर जिससे ज्ञान प्राप्त किया जाए (उपदेशक, वक्ता, अध्यापक), उसकी अपादान संज्ञा होकर पञ्चमी विभक्ति होती है।
उदाहरण: सः उपाध्यायात् अधीते (वह गुरु से पढ़ रहा है)।
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4-भुवः प्रभवश्च
भू’ धातु के कर्त्ता (उत्पत्ति स्थान) की अपादान संज्ञा होती है।
उदाहरण:
गंगा हिमलायात् प्रभवति (गंगा हिमालय से निकलती है)।
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षष्ठी विभक्ति (सम्बन्ध कारक)
1-षष्ठी शेषे
प्रातिपदिकार्थ, लिंगपरिमाणमात्र, वचनमात्र और प्रातिपदिकार्थ के अतिरिक्त जो शेष कारक-प्रसंग से बचा हुआ सम्बन्ध है, उसमें षष्ठी विभक्ति होती है। यह कारक नहीं माना जाता, बल्कि पदों का आपस में सम्बन्ध बताता है।
उदाहरण:
राज्ञः पुरुषः (राजा का पुरुष/आदमी)।
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सप्तमी विभक्ति (अधिकरण कारक)
1-आधारोऽधिकरणम्
क्रिया के आधार (जिस स्थान या वस्तु पर क्रिया सम्पन्न हो) की अधिकरण संज्ञा होती है।
2-सप्तमी अधिकरणे च
अधिकरण कारक में सप्तमी विभक्ति होती है।
उदाहरण:
तिलेषु तैलम् (तिलों में तेल है)।
मुनौ भक्तिः (मुनि में भक्ति है)।
3-यश्च भावेन भावलक्षणम्
एक क्रिया के बाद दूसरी क्रिया के होने पर जो पूर्व क्रिया (और उसका कर्त्ता) होती है, उसमें सप्तमी विभक्ति होती है।
उदाहरण:
गते सूर्ये अग्निहोत्रं जुहुयात् (सूर्य के अस्त होने पर अग्निहोत्र करना चाहिए)।
बालके रुदति माता जगाम (बालक के रोने पर माता चली गई)।
4-यतः च निर्धारणम् (पा० सू० २। ३। ४१)
बहुतों में से किसी एक को जब श्रेष्ठ या अलग बताया जाए, तब उस समूहवाचक शब्द में षष्ठी या सप्तमी विभक्ति होती है।
उदाहरण:
कविषु कालिदासः श्रेष्ठः (कवियों में कालिदास श्रेष्ठ हैं)।

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