Bihar Board Class 12 History बंधुत्व, जाति तथा वर्ग : आरंभिक समाज
अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर
प्रश्न 1.
इतिहासकार साहित्यिक परम्पराओं का अनुसरण क्यों करते हैं?
उत्तर:
कुछ ग्रंथ सामाजिक व्यवहार के मानदण्ड निर्धारित करते थे।
अन्य ग्रंथ समाज का चित्रण करते थे।
ये ग्रंथ कभी-कभी समाज में विद्यमान विभिन्न रिवाजों पर अपनी टिप्पणी प्रस्तुत करते थे।
प्रश्न 2.
महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण कब और किसके नेतृत्व में शुरू हुआ?
उत्तर:
1919 में प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान वी० एस० सुकथांकर के नेतृत्व में।
प्रश्न 3.
महाभारत को विशाल महाकाव्य क्यों कहते हैं?
उत्तर:
महाभारत वर्तमान स्वरूप में एक लाख से अधिक श्लोकों का है और इसमें विभिन्न सामाजिक श्रेणियों और परिस्थितियों का लेखा-जोखा है।
इस ग्रंथ की रचना लगभग सा०यु०पू० 500 से आगे 1000 वर्ष तक होती रही।
प्रश्न 4.
महाभारत के प्रेषण में अनेक प्रभेद क्यों सामने आते हैं?
उत्तर:
प्रभावशाली परंपराओं और लचीले स्थानीय विचार और आचरण के बीच संवाद कायम करके सामाजिक इतिहास लेखन के कारण तथा।
इन संवादों में द्वन्द्व और मतैक्य दोनों की समालोचना रहने के कारण।
प्रश्न 5.
अंतर्विवाह और बहिर्विवाह में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
गोत्र के भीतर होने वाले और गोत्र से बाहर या अन्य गोत्र के साथ स्थापित किए जाने वाल विवाह-संबंध।
प्रश्न 6.
वंश क्या है?
उत्तर:
किसी भी परिवार का पीढ़ी-दर-पीढ़ी विकास-क्रम।
प्रश्न 7.
इतिहासकार परिवार और बंधुता संबंधी विचारों का विश्लेषण क्यों करते हैं?
>>>उत्तर:
समाज की मूल इकाई परिवार होने से उनको धारणा का समय-विशेष में कार्यान्वयन समझने के लिए अथवा सामाजिक इतिहास लेखन के लिए।
प्रश्न 8.
पितृवंशिकता और मातृवंशिकता में क्या अंतर है?
उत्तर:
क्रमश: पिता के पुत्र फिर पौत्र, प्रपौत्र आदि और माता से जुड़ी हुई वंश परंपरा।
प्रश्न 9.
ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में वर्गों की उत्पत्ति के क्या उल्लेख हैं?
उत्तर:
जगत के सभी तत्त्व जिनमें चारों वर्ण शामिल हैं आदि मानव के शरीर से उपजे थे।
ब्राह्मण उसका मुँह था, उसकी भुजाओं से क्षत्रिय बना, वैश्य उसकी जंधा थी। उसके पैर से शूद्र की उत्पत्ति हुई।
प्रश्न 10.
द्रोणाचार्य ने एकलव्य का अंगूठा क्यों मांगा?
उत्तर:
अर्जुन की प्रतिष्ठा तत्कालीन सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर को बनाए रखने के लिए।
प्रश्न 11.
मंदसौर अभिलेख में वर्णित रेशम के बुनकरों की सामाजिक स्थिति क्या थी?
उत्तर:
ये लाट (गुजरात) प्रदेश के निवासी थे लेकिन कालान्तर में यहाँ से मंदसौर चले गये।
उन्होंने तत्कालीन लाट शासक के अत्याचारों से तंग आकर मंदसौर के जनप्रिय शासक की शरण पाने के लिए यह देशांतर किया था।
प्रश्न 12.
बहुपत्नी प्रथा एवं बहुपति प्रथा में क्या अंतर है?
उत्तर:
क्रमशः एक पुरुष की अनेक पलियाँ होना और एक स्त्री के अनेक पति होना।
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प्रश्न 13.
आचार-संहितायें क्यों तैयार की गई?
उत्तर:
विविध जन-समुदाय के साथ विचारों का आदान-प्रदान होने की दशा में अपनी-अपनी विशिष्ट पहचान को बनाए रखने के लिए।
प्रश्न 14.
गोत्र क्या है? इसके क्या नियम थे?
उत्तर:
ऋषियों की वंश-परंपरा।
विवाह पश्चात् स्त्रियों के गोत्र की पहचान पति के गोत्र से होना और अन्तर्विवाह की मान्यता का न रहना। एक ही गोत्र के सदस्य आपस में विवाह संबंध नहीं रख सकते थे।
प्रश्न 15.
दो साक्ष्य बताइए जिसमें व्यक्ति का नाम माँ से शुरू होता था।
उत्तर:
सातवाहन राजाओं के नाम यथा-गौतमीपुत्र शातकर्णी।
बृहदारण्यक उपनिषद में वर्णित आचार्यों और शिष्यों को पीढ़ियों की सूची।
प्रश्न 16.
वर्ण व्यवस्था के नियमों का पालन करवाने के लिए ब्राह्मणों ने क्या नीतियाँ अपनायीं?
उत्तर:
वर्ण व्यवस्था की उत्पत्ति का दैवी सिद्धांत प्रतिपादित किया।
इस व्यवस्था के नियमों का अनुपालन कराने का शासकों को निर्देश।
प्रतिष्ठा के जन्म पर आधारित होने की जन जागरूकता उत्पन्न करना।
प्रश्न 17.
600 सा०यु०पू० से 600 सायु० के दौरान हुए आर्थिक तथा राजनीतिक परिवर्तनों ने समकालीन समाज पर क्या प्रभाव डाला?
उत्तर:
शिल्प विशेषज्ञों के एक विशिष्ट सामाजिक समूह का उदय हुआ।
सम्पत्ति के असमान वितरण से सामाजिक विषमताएँ बढ़ गयीं।
वन क्षेत्रों में कृषि व्यवसाय का विस्तार होने से वहाँ रहने वाले लोगों की जीवन शैली में बदलाव आया।
प्रश्न 18.
महाभारत की मूल कथा का संबंध किससे है?
उत्तर:
महाभारत की मूल का संबंध कौरव तथा पाण्डव नामक दो रक्त-संबंध परिवारों के बीच युद्ध से है।
महाभारत के कुछ भाग विभिन्न सामाजिक समुदायों के आचार व्यवहार के मानदण्ड तय करते हैं क्योंकि इस ग्रंथ के मुख्य पात्र इन्हीं मानदण्डों का अनुसरण करते हुए दिखाई देते हैं।
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प्रश्न 19.
मनुस्मृति क्या थी? इसका संकलन कब हुआ?
उत्तर:
मनुस्मृति धर्मशास्त्रों तथा धर्मसूत्रों में सबसे बड़ा ग्रंथ था।
इसका संकलन लगभग 200 सा०यु०पू० से 200 सा०यु० के बीच हुआ।
प्रश्न 20.
बाघ सदृश पति किसको और किसने कहा?
उत्तर:
नरभक्षी राक्षस की बहन हिडिम्बा ने पाडव भीम को।
प्रश्न 21.
मनुमृति में चाण्डालों के क्या कर्त्तव्य बताये ये हैं?
उत्तर:
गाँव की सीमा से बाहर निवास करें।
उच्छिष्ट बर्तनों का इस्तेमाल करें।
मृतकों के वस्त्र तथा लोहे के आभूषण पहनें।
गाँव और नगरों का भ्रमण रात को न करें।
प्रश्न 22.
आरंभिक समाज में पैतृक संपत्ति का बंटवारा किस प्रकार होता था?
उत्तर:
ज्येष्ठ पुत्र को विरासत का विशेष हिस्सा और अन्य पुत्रों में समान वितरण।
प्रश्न 23.
आरंभिक समाज में स्त्री और पुरुष किस प्रकार संपत्ति अर्जित कर सकते थे?
उत्तर:
मनुस्मृति के अनुसार पुरुष सात प्रकार से धन अर्जित कर सकते थे। विरासत, खोज, खरीद, विजय, निवेश, कार्य तथा भेंट के द्वारा।
स्त्रियों के लिए संपत्ति अर्जन के छः तरीके थे। वैवाहिक अग्नि के सामने तथा वधुगमन के समय मिली भेंट, स्नेह के प्रतीक के रूप में तथा भ्राता, माता और पिता द्वारा दिए गये उपहार आदि।
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प्रश्न 24.
महाकाव्य काल में सांपत्तिक अधिकार के मुख्य आधार क्या हैं?
उत्तर:
इसके मुख्य आधार-लिंग तथा वर्ण थे। लिंग के आधार पर पिता की सम्पत्ति पर केवल उसके पुत्रों का अधिकार होता था।
वर्ण व्यवस्था में तीनों उच्च वर्गों की सेवा करके ही शूद्र धन अर्जित कर सकते थे जबकि अन्य वर्ण एक से अधिक कार्यों से धन अर्जित कर सकते थे।
प्रश्न 25.
वर्ण और जात में क्या अन्तर है?
उत्तर:
चार वर्ण-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के आपसी मेल से जातियों का जन्म हुआ।
वर्गों का विभाजन कार्य के आधार पर किया गया जबकि जातियाँ जन्म पर आधारित थीं।
लघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर
प्रश्न 1.
बीसवीं शताब्दी में किए गए महाभारत संकलन के विभिन्न सोपानों का वर्णन कीजिए। अथवा, महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण तैयार करने के लिए क्या-क्या कार्य किये गये?
उत्तर:
बीसवीं शताब्दी में किए गए महाभारत संकलन के विभिन्न सोपान –
1919 में प्रसिद्ध विद्वान वी० एस० सुकथांकर के नेतृत्व में एक अत्यन्त महत्त्वाकांक्षी परियोजना की शुरूआत हुई। अनेक विद्वानों ने मिलकर महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण तैयार करने का उत्तरदायित्व अपने ऊपर लिया।
आरम्भ में देश के विभिन्न भागों से विभिन्न लिपियों में लिखी गई महाभारत की संस्कृत पांडुलिपियों को एकत्रित किया गया।
पांडुलिपियों में पाए जाने वाले उन श्लोकों को चुना गया जो लगभग सभी पांडुलिपियों में पाये गये।
उनका प्रकाशन 13,000 पृष्ठों में अनेक खंडों में किया गया।
संस्कृत के पाठों में समानता ढूंढने का प्रयास किया गया।
महाभारत के प्रेषण में अनेक क्षेत्रीय प्रभेदों का विवरण भी रखा गया।
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प्रश्न 2.
प्राचीन भारतीय इतिहास में उपनिषदों का क्या महत्त्व है?
>>>उत्तर:
उपनिषद्:
उपनिषद् वैदिक साहित्य का अंतिम रूप है, इसलिए इन्हें वेदान्त भी कहते हैं। उपनिषद् का अर्थ है-ब्रह्म-ज्ञान के सिद्धांत। इनमें आत्मा और परमात्मा के स्वरूप का परिचय कराया गया है। इनमें कर्म, माया और मोक्ष के सिद्धांतों का विस्तार से वर्णन किया गया है।
उपनिषदों में यज्ञों तथा कर्मकाण्ड की अपेक्षा जीवन की पवित्रता, सदाचार और अच्छे कर्मों पर बल दिया गया है। मुण्डकोपनिषद् में साफ लिखा है “यज्ञ रूपी नौकाएँ कमजोर हैं । संसार सागर से तरने के लिए इन पर भरोसा नहीं किया जा सकता”।
उपनिषद् संख्या 108 में हैं लेकिन इनमें 11 उपनिषद् ही महत्त्वपूर्ण एवं प्रसिद्ध हैं। उपनिषद् ज्ञान के सर्वोत्तम भण्डार हैं। ये इतने लोकप्रिय हो चुके हैं कि संसार की कई भाषाओं में इनके अनुवाद हो चुके हैं। जर्मन विद्वान मैक्समूलर ने उपनिषदों की प्रशंसा करते हुए लिखा है – “उपनिषद् संसार के साहित्य में सदा महत्त्वपूर्ण स्थान रखेंगे तथा प्रत्येक काल और प्रत्येक जाति में वे मनुष्य-मात्र की मानसिक उन्नति के प्रतीक रहेंगे।”
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प्रश्न 3.
पितृवंशिक व्यवस्था की विशेषतायें बताइए।
उत्तर:
पितृवंशिक व्यवस्था की विशेषतायें:
महाभारत युद्ध के पश्चात् पितृवंशिक उत्तराधिकार की घोषणा की गई। यद्यपि पितृवंशिकता महाकाव्य की रचना से पूर्व भी थी। परंतु महाभारत की मुख्य कथावस्तु ने इस आदर्श को सुदृढ़ किया।
पितृवंशिकता में पुत्र पिता की मृत्यु के पश्चात् उनके संसाधनों का उत्तराधिकारी हो जाता था।
अधिकांश राजवंश सा०यु०पू० छठी शताब्दी से पितृवंशिकता प्रणाली का अनुसरण करते थे।
कभी-कभी पुत्र के न होने पर भाई एक-दूसरे का उत्तराधिकारी बन जाता था। यही नहीं बंधु-बांधव भी गद्दी पर आसीन हो जाते थे। स्त्रियाँ गद्दी पर बैठ जाती थीं।
राजवंशों में पितृवंशिकता के प्रति झुकाव ऋग्वैदिक काल से था।
प्रश्न 4.
कौरव-पांडवों के मध्य युद्ध के क्या कारण थे?
उत्तर:
कौरव-पांडवों के मध्य युद्ध के कारण:
धृतराष्ट्र कौरव और पांडु उनके छोटे भ्राता थे। धृतराष्ट्र के अंधे होने के कारण पांडु को हस्तिनापुर का राजा बनाया गया। अक्षम धृतराष्ट्र के अंतर्मन में द्वेष का प्रस्फुलन इसी घटना से हुआ।
पांडु की असामयिक मृत्यु के पश्चात् धृतराष्ट्र राजा बने लेकिन वे दुर्योधन को युवराज पद दिलाने की उत्कंठा रखते थे।
हस्तिनापुर के नागरिकों पांडवों के प्रति अधिक लगाव था क्योंकि वे कौरव राजकुमारों से अधिक योग्य और सदाचारी थे। यह देखकर कौरवों को ईर्ष्या होने लगी।
कौरवों ने पांडवों के विरुद्ध अनेक प्रकार के षड्यंत्र रचे जिससे पांडव दु:खी और व्यथित हो गये।
अंततः कौरवों ने पांडवों को राज्य में हिस्सा देने से भी इंकार कर दिया।
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प्रश्न 5.
सातवाहनों की वैवाहिक प्रथा में विविधता थी, विवेचना कीजिए।
उत्तर:
सातवाहनों की वैवाहिक प्रथा:
कुछ सातवाहन शासक बहुपत्नी प्रथा को मानने वाले थे जिसमें उनकी एक से अधिक पत्नियाँ होती थीं।
सातवाहन शासकों से विवाह करने वाली रानियों के नाम गौतम तथा वशिष्ठ गोत्रों उद्भूत थे जो उनके पिता के गोत्र थे। इससे स्पष्ट होता है कि विवाह के बाद भी उन्होंने पिता के गोत्र को कायम रखा था। यह मनुस्मृति की नहीं बल्कि ब्राह्मणीय व्यवस्था थी।
कुछ रानियाँ एक ही गोत्र से थीं। यह उदाहरण अंतर्विवाह ‘पद्धति अर्थात् बंधुओं के बीच विवाह संबंध मान्य रहने की स्थिति को दर्शाता है।
इसमें बांधवों (ममेरे, चचेरे आदि भाई-बहन) के बीच विवाह संबंधों की वजह से एक सुसंगठित समुदाय बनने की पूर्वधारणा निहित थी।
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प्रश्न 6.
उत्तर वैदिक काल में ब्राह्मणों के महत्त्व पर चर्चा कीजिए।
उत्तर:
उत्तर वैदिक काल में ब्राह्मणों का महत्त्व:
यज्ञों के प्रसार के कारण ब्राह्मणों को महत्त्व बढ़ गया था। वे अपने और अपने यजमानों के लिए पूजा-पाठ और यज्ञ कराते थे।
वे अपने राजाओं की विजय एवं सफलता के लिए भी अनुष्ठान करते थे।
अपने सम्मान के लिए ब्राह्मणों को क्षत्रियों से युद्ध करना पड़ता था।
ज्ञान, विद्वता और कर्मकाण्डों के बढ़ते हुए महत्त्व के कारण क्षत्रिय भी ब्राह्मणों को विशेष आदर देते थे। आगे चलकर इन्हें पृथ्वी का देवता (भूसुर) समझा जाने लगा था।
वस्तुतः ब्राह्मणों ने अपनी स्थिति सर्वोच्च बनाने के लिए कालान्तर में क्षत्रियों से तालमेल स्थापित कर लिया। उन्होंने क्षत्रियों को शासन का अधिकार और स्वयं को उनका परामर्शदाता (पुरोहित) कहा।
प्रश्न 7.
जब कौरवों और पांडवों के बीच युद्ध अवश्यंभावी हो गया तो गांधारी ने दुर्योधन से क्या विनती की?
उत्तर:
गांधारी की दुर्योधन से विनती:
गांधारी ने दुर्योधन को युद्ध से हटने की सलाह दी।
अपने पिता, माता और शुभेच्छुओं का सम्मान करते हुए शांति-संधि करने का सुझाव दिया।
राज्य की रक्षा के लिए विवेकपूर्ण इन्द्रिय निग्रही बनने की सीख दी।
एक अच्छे राजा का वर्चस्व स्थापित करने के लिए लालच और क्रोध को त्यागने की सलाह दी।
अर्थ और धर्म की प्राप्ति के लिए युद्ध के परित्याग को ही एकमात्र साधन बताया।
युद्ध में सफल होने की झूठी महत्त्वाकांक्षा को त्यागने के लिए बल दिया।
प्रश्न 8.
चारों वर्गों के लिए आदर्श जीविका से जुड़े नियमों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
चारों वर्षों के लिए आदर्श “जीविका के नियम:
ब्राह्मण: ब्राह्मणों का कार्य अध्ययन, वेदों की शिक्षा, यज्ञ करना और करवाना था तथा उनका काम दान देना और लेना था।
क्षत्रिय: क्षत्रियों का काम युद्ध करना, लोगों को सुरक्षा-प्रदान करना न्याय करना, वेद-पढ़ना, यज्ञ करवाना और दान-दक्षिणा देना था।
वैश्य: क्षत्रियों के अंतिम तीन कार्य वैश्यों के लिए भी थे साथ ही उनसे कृषि, गौ पालन और व्यापार का कार्य भी अपेक्षित था।
शूद्र: शूद्रों के लिए मात्र एक ही जीविका-तीनों वर्गों की सेवा थी।
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प्रश्न 9.
प्राचीन भारत में सम्पत्ति की दृष्टि से स्त्री की स्थिति स्पष्ट करें। अथवा, प्राचीन काल में संपत्ति के अधिकार प्राप्त करने के कारण पुरुष और महिलाओं के मध्य सामाजिक भेद-भावों को तीक्ष्णता कैसे प्राप्त हुई?
उत्तर:
प्राचीन भारत में संपत्ति की दृष्टि से स्त्री की स्थिति –
मनुस्मृति में पुत्रों को पैतृक संपत्ति का हकदार बताया गया है परंतु स्त्रियों की हिस्सेदारी का कोई उल्लेख नहीं है।
विवाह के समय मिले उपहारों पर स्त्रियों का स्वामित्व माना जाता था और इसे स्त्रीधन को संज्ञा दी जाती थी।
स्त्रीधन को उनकी संतान विरासत के रूप में प्राप्त कर सकती थी परंतु इस पर उनके पति का कोई अधिकार नहीं होता था।
मनुस्मृति स्त्रियों को पति की आज्ञा के विरुद्ध पारिवारिक संपत्ति रखे अथवा स्वयं अपने बहुमूल्य धन के गुप्त संचय के विरुद्ध भी चेतावनी देती है।
वाकाटक रानो प्रभावती गुप्त सम्पत्ति पर अधिकार रखती थी। वस्तुत: सम्पत्ति पर स्त्री का अधिकार उसकी माली हालत या सामाजिक प्रभाव पर निर्भर था।
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प्रश्न 10.
जाति-प्रथा से आप क्या समझते हैं? जाति-प्रथा के दोष बताइए।
उत्तर:
जाति-प्रथा का अर्थः शाम शास्त्री ने अपनी सुप्रसिद्ध पुस्तक ‘जाति की उत्पत्ति’ में जाति-प्रथा की परिभाषा इन शब्दों में दी है, “विवाह और भोजन जैसे कार्यों में कुछ लोगों के आपस में संगठित हो जाने को जाति-प्रथा कहते हैं।”
प्राचीन काल में सामाजिक विषयों के लिए हिन्दू समाज केवल चार वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) में बँटा हुआ था। इन्हीं वर्गों को बाद में जातियाँ कहा जाने लगा। आरम्भ में जाति-पाँति का विचार केवल व्यवसायों को दृष्टि से ही किया जाता था और व्यक्ति एक जाति से दूसरी जाति में सुगमता से दाखिल हो जाता था परंतु धीरे-धीरे जाति-प्रथा जन्म से मानी जाने लगी और एक जाति से दूसरी जाति में जाना असम्भव हो गया। इस प्रकार चार मुख्य वर्ण बढ़ते-बढ़ते अब कोई 3,000 जातियों तक पहुँच चुके हैं।
जाति-प्रथा के दोष :
1. ईर्ष्या और द्वेष का कारण:
दिन-प्रतिदिन जातियों की संख्या बढ़ने और जाति-प्रथा दृढ़ होने का यह परिणाम हुआ कि भिन्न-भिन्न जातियों में परस्पर ईर्ष्या और द्वेष बढ़ने लगा। किसी विदेशी आक्रमणकारी का मुकाबला करने के लिए भी ये जातियाँ संगठित नहीं हुई। इस प्रकार देश आक्रमणकारियों से पद्दलित होने लगा।
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2. व्यक्तिगत उन्नति में बाधक:
नीची जाति में उत्पन्न होने वाले विद्वान लोग किसी आदरणीय स्थान को प्राप्त न कर पाते थे। जाति-प्रथा वस्तुतः व्यक्तिगत उन्नति के मार्ग में बाधा सिद्ध हुई।
3. अन्तर्जातीय विवाह के मार्ग में बाधक:
जाति-प्रथा की कठोरता ने हिन्दुओं में विवाह के क्षेत्र को बहुत ही संकुचित कर रखा है। इसके परिणामस्वरूप कुछ लोग अविवाहित रह जाते हैं। वे किसी अन्य धर्म को अपना लेते हैं या अपने ही समाज में ब्यभिचार फैलाते हैं।
4. धार्मिक उन्नति में बाधक:
जाति प्रणाली में असमानता के कारण हिन्दू धर्म में आने वाली अन्य जातियों को बराबरी का दर्जा नहीं दिया जा सका। इस प्रकार अन्य धर्मावलम्बी हिन्दू धर्म के साथ सामजस्य नहीं बना पाए।
5. अस्पृश्यता को जन्म देना:
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य आदि तीनों उच्च वर्ण के लोग शूद्रों को घृणा की दृष्टि से देखने लगे और उन्हें अछूत समझने लगे। उन्हें कुँओं से पानी भरने और मंदिरों में पूजा करने से भी रोक दिया। परिणाम यह हुआ कि शूद्र अन्य धर्म ग्रहण करने। लगे क्योंकि वहाँ उन्हें विभेद की दृष्टि से नहीं देखा जाता था।
प्रश्न 11.
वणिक कौन थे?
उत्तर:
वणिक:
भारतीय अभिलेख और संस्कृत ग्रंथों में वणिक शब्द का प्रयोग व्यापारियों के लिए किया गया है।
यद्यपि शास्त्रों में व्यापार को वैश्यों का कार्य बताया गया है परंतु कई साक्ष्य इसके विरुद्ध जाते हैं।
शूद्रक के नाटक ‘मृच्छकटिकम् (चौथी शताब्दी ई.) में नायक चारुदत्त को ब्राह्मण वणिक बताया गया है।
पाँचवीं शताब्दी सा०यु० के एक अभिलेख में उन दो भाइयों को क्षत्रिय वणिक कहा गया है जिन्होंने एक मंदिर निर्माण के लिए आर्थिक अनुदान दिया था।
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प्रश्न 12.
श्रेणियों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
श्रेणियाँ (Guilds):
एक ही जीविका अथवा व्यवसाय से जुड़ी जातियों को कभी-कभी श्रेणियों से संगठित किया जाता था।
कई ऐसे अभिलेख मिले हैं। जिनमें जातियों को श्रेणियों के नाम दिए गए। उदाहरण के लिए मंदसोर अभिलेख में एक जुलाहों की श्रेणी का वर्णन किया गया है जोकि गुजरात लाट (Lata) नगर में था।
कई जातियाँ परिवार सहित एक स्थान को छोड़कर दूसरे ऐसे स्थान पर बसने लगी जहाँ उन्हें व्यवसाय के लिए अधिक सुविधायें प्राप्त हो सकती थीं।
अभिलेखों से ज्ञात होता है कि किसी व्यक्ति को अपने शिल्प में निपुणता के आधार पर श्रेणी विशेष का सदस्य बनाया जाता था।
कई बार भिन्न-भिन्न व्यवसाय के लोगों को भी एक ही श्रेणी का सदस्य बना लिया जाता था।
श्रेणी के सदस्य अपना सारा धन एकत्र करके किसी कार्य में लगा सकते थे। कई श्रेणियों अपने ईष्टदेव सूर्य के मंदिर स्थापित करने के लिए दान भी देती थीं।
प्रश्न 13.
गोत्र की उत्पत्ति कैसे हुई? सातवाहन वंश में इसका उल्लंघन किस प्रकार किया गया।
उत्तर:
गोत्र की उत्पत्ति:
1000 सा०यु०पू० के पश्चात् ब्राह्मणों ने लोगों को गोत्रों में विभाजित किया। प्रत्येक गोत्र एक वैदिक ऋषि के नाम पर होता था। उस गोत्र के सदस्य उस ऋषि के वंशज माने जाते थे।
गोत्रों के लिए दो महत्त्वपूर्ण नियम थे। प्रथम विवाह के पश्चात् स्त्रियों को उनके पिता के स्थान पर अपने पति के गोत्र को स्वीकार करना पड़ता था। द्वितीय-एक ही गोत्र के सदस्य आपस में विवाह संबंध नहीं रख सकते थे।
सातवाहन वंश में गोत्र के नियमों का अपवाद मिलता है। सातवाहन राजाओं से विवाह करने वाली रानियों के नामों के विश्लेषण से पता चलता है कि उनके नाम गौतम तथा वशिष्ठ गोत्रों से लिए गए थे जो उनके पिता के गोत्र थे।
इससे ज्ञात होता है कि इन रानियों ने विवाह के बाद भी अपने पति-कुल के गोत्र को ग्रहण करने के बजाय अपने पिता के गोत्र को बनाये रखा।
कुछ सातवाहन शासकों की रानियों ने पति के गोत्र को अपना लिया।
प्रश्न 14.
>“सांची और अन्य स्थानों की वास्तुकता को समझने के लिए बौद्ध धर्म ग्रन्थों का अध्ययन आवश्यक है।” उपर्युक्त कथन की सोदाहरण तर्कसंगत समीक्षा कीजिए।
उत्तर:
वास्तुकला को समझने के लिए बौद्ध ग्रंथों के अध्ययन का महत्त्व:
सांची के स्तूप के तोरण द्वारा पर एक दृश्य अंकित है जिसमें फूस की झोपड़ी और पेड़ों वाले ग्रामीण दृश्य हैं। वस्तुतः वेसान्तर जातक में इससे सम्बन्धित कहानी दी गई है। इस कहानी में दानी राजकुमार अपना सबकुछ एक ब्राह्मण को सौंपकर अपनी पत्नी और बच्चों के साथ जंगल में चला जाता है। बौद्ध से ज्ञात होता है बुद्ध द्वारा सारनाथ में दिए गए पहले उपदेश का प्रतीक चक्र था।
शालमंजिका की मूर्ति के बारे में बौद्ध ग्रंथों से ही जानकारी मिल पाती है। इससे पता चलता है जो लोग बौद्ध धर्म में आए उन्होंने इससे पहले दूसरे विश्वासों, प्रथाओं और धारणाओं से बौद्ध धर्म को समृद्ध किया। सांची के तोरणद्वारों की मूर्तियों में पाए गए कई प्रतीक या चिह्न इन्हीं परम्पराओं से उत्कीर्ण किए गएं।
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प्रश्न 15.
भगवद्गीता के विषय में आप क्या जानते हैं?
>>>उत्तर:
भगवदगीता:
1. महाभारत का सर्वाधिक उपदेशात्मक अंश ‘भगवद्गीता’ है। इसका शाब्दिक अर्थ-भगवान का गीता या युद्ध भूमि में, कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया उपदेश है।
2. इसकी मूलभाषा संस्कृत है परंतु आज इसका विश्व की अनेक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। इस ग्रंथ में कुल 18 अध्याय है।
3. सारथी के रूप में भगवान कृष्ण अर्जुन के साथ रथ पर सवार थे। कौरवों और पांडवों की सेनायें युद्ध करने के लिए आमने-सामने खड़ी थी। अर्जुन ने कौरवों की सेना में अपने सगे-सम्बन्धियों को देखकर युद्ध करने से इंकार कर दिया ऐसे अवसर पर श्री कृष्ण ने अर्जुन को आसक्ति रहित होकर युद्ध करने का जो उपदेश दिया वही भगवद् गीता के नाम से प्रसिद्ध है।
4. यह ग्रंथ बताता है कि मनुष्य के अपने कर्म फल की चिंता किए बिना (निष्काम कर्म) करना चाहिए।
प्रश्न 16.
साहित्यिक परम्पराओं का अध्ययन करते समय इतिहासकारों को कौन-कौन सी बातों को ध्यान में रखना चाहिए। व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
साहित्यिक परम्पराओं का अध्ययन करते समय ध्यान देने योग्य बातें:
ग्रंथों की भाषा पालि, प्राकृत, तमिल जैसी आम लोगों की भाषा अथवा संस्कृत जैसी पुरोहितों या किसी विशेष वर्ग की भाषा है।
ग्रंथ के लेखक की समग्र जानकारी प्राप्त करना चाहिए। उसके दृष्टिकोण तथा विचारों को भलीभाँति समझने की आवश्यकता है।
ग्रंथ के संभावित संकलन या रचनाकाल की जानकारी प्राप्त करनी चाहिए और उसकी रचना भूमि का विश्लेषण करना चाहिए।
ग्रंथ की रचना का स्थान भी ज्ञात करना चाहिए।
यह ध्यान रखा जाए कि ग्रंथ मंत्रों या कथा के रूप में हैं।
ग्रंथ के प्रयोज्य विषय और व्यक्ति की समग्र जानकारी प्राप्त की जाए।
प्रश्न 17.
महाभारत प्राचीनकाल से सामाजिक मूल्यों के अध्ययन का एक अच्छा साधन हैं। उचित तर्क देकर इस कथन की पुष्टि कीजिए।
उत्तर:
महाभारत प्राचीनकाल के सामाजिक मूल्यों के अध्ययन का स्रोत:
उस काल में पितूंवशिकता प्रणाली पर आधारित राजवंश थे। पैतृक सम्पत्ति पर पुत्रों का अधिकार होता था और पुत्र-जन्म को महत्त्व दिया जाता था, क्योंकि उन्हें ही वंश चलाने वाला माना जाता था।
स्त्रियों का विशेष आदर नहीं था। उनका विवाह गोत्र से बाहर कर दिया जाता था। कन्यादान पिता का महत्त्वपूर्ण कर्त्तव्य माना जाता था।
महाभारत स्वजनों के मध्य युद्ध का एक अद्भुत उदाहरण है परंतु इस युद्ध में सभी वर्गों के लोग लिप्त हो गये थे।
यह ग्रंथ विभिन्न सामाजिक समूहों के आपसी संबंधों पर प्रकाश डालता है। उदाहरण के लिए-हिडिम्बा का भीम से विवाह।
उच्च परिवारों में बहुपति प्रथा प्रचलित थी। उदाहरण के लिए-द्रोपदी के पाँच पति थे।
स्त्रियाँ पुरुष की सम्पत्ति समझी जाती थी इसीलिए युधिष्ठर ने अंत में द्रोपदी को द्यूतक्रीड़ा के समय दाँव पर लगा दिया था।
प्रश्न 18.
निषाद और इसके समान जातियों की भारतीय समाज में क्या स्थिति थी?
उत्तर:
निषाद और इसके समान जातियों की भारतीय समाज में स्थिति:
निषाद और कुछ अन्य जातियाँ ब्राह्मणीय विचारों से अप्रभावित थीं।
संस्कृत साहित्य में ऐसे समुदायों को प्रायः असभ्य और पशुवत बताया गया है।
शिकार करके और कंदमूल एकत्र करके जीवन निर्वाह करने वाली जातियों को तुच्छ समझा जाता था। निषाद (शिकारी) वर्ग इसका उदाहरण है।
यायावर पशुपालकों के समुदाय को भी संदेह की दृष्टि से देखा जाता था, क्योंकि उन्हें स्थायी कृषक समुदायों के साँचे में आसानी से नहीं ढाला जा सकता था।
कभी-कभी इन लोगों को म्लेच्छ कहा जाता था परंतु उन्हें घृणा की दृष्टि से देखा जाता था।
Class 12 History bandhutatv jati thata varg: aarmbhik samaj
प्रश्न 19.
>“प्राचीन काल में ब्राह्मणीय ग्रंथों के नियमों का सभी जगह पालन नहीं होता था।” पाँच प्रमाण देकर इसकी पुष्टि कीजिए।
उत्तर:
ब्राह्मण ग्रंथों के अनुसार केवल क्षेत्रिय ही शासक हो सकते थे परंतु कई शासक परिवार ब्राह्मण या वैश्य भी थे। उदाहरणार्थ-पुष्यमित्र शुग।
जाति से बाहर भी विवाह होते थे जबकि ब्राह्मणीय ग्रंथों में इसकी अनुमति नहीं थी।
ब्राह्मणों को धनी दर्शाया जाता था परंतु सुदामा जैसे अति निर्धन ब्राह्मणों का उल्लेख भी है।
स्त्रियों से अपेक्षा की जाती थी कि वे विवाह के पश्चात् अपने गोत्र का त्याग कर देंगी और अपने पति का गोत्र अपना लेंगी। परंतु सातवाहन रानियों ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने अपने पिता के गोत्र को बनाये रखा।
कई ऐसे वर्ग थे जिनका पेशा वर्ण व्यवस्था से मेल नहीं खाता था; जैसे निषाद या घुम्मकड़ पशुपालक।
प्रश्न 20.
सातवाहन कालीन वास्तुकला का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सातवाहन कालीन वास्तुकला:
सातवाहन शासकों को गुफायें, विहार, चैत्य और स्तूप बनवाने का बड़ा शौक था। दक्षिण में अधिकाँश गुफाओं का निर्माण इसी काल में हुआ। उड़ीसा, नासिक, कार्ले, भुज आदि की गुफायें, विहार, चैत्य और स्तूप अपनी निर्माण-शैली और अलंकरण के कारण वास्तुकला के सुन्दर नमूने हैं।
चैत्य एक बड़ा हॉल होता था, जिसमें अनेक खम्भे होते थे। विहार में एक केन्द्रीय हॉल होता था जिसके सामने के बरामदे में द्वार से प्रवेश होता था। कार्ले का चैत्य बहुत प्रसिद्ध है।
यह 40 मीटर लम्बा, 15 मीटर चौड़ा और 15 मीटर ऊँचा है। इसके दोनों ओर 15-15 खम्भों की पंक्तियाँ हैं। प्रत्येक खम्भा वर्गाकार सीढ़ीदार कुर्सी पर स्थित है। प्रत्येक खम्भे के शिखर पर हाथी, घोड़े और सवार बनाये गए हैं। छतों पर भी सुन्दर चित्रकारी की गई है। भिक्षुओं के निवास हेतु विहार बनाए गए थे।
सबसे महत्त्वपूर्ण स्मारक स्तूप हैं। सबसे प्रसिद्ध स्तूप अमरावती और नागार्जुनकोंडा के हैं। स्तूप एक बड़ी इमारत होती थी जिसे बुद्ध के किसी अवशेष पर बनाया जाता था। अमरावती स्तूप का गुम्बद आधार के आर-पार 162 फुट है और इसकी ऊँचाई 100 फुट है। नागार्जुनकोंडा में स्तूपों के अतिरिक्त ईंटों के बने प्राचीन हिन्दू मंदिर भी हैं। इन दोनों स्तूपों में मूर्तियों की भरमार है।
इस काल में अनेक मूर्तियों का भी निर्माण किया गया। अधिकांश मूर्तियाँ महात्मा बुद्ध के जीवन की अनेक घटनाओं का चित्रण करती हैं। अमरावती के स्तूप में बुद्ध के चरण की पूजा का अनुपम दृश्य है। नागार्जुनकोंडा में महात्मा बुद्ध का उपदेश, शांति और गम्भीरता को प्रकट करता है।
प्रश्न 21.
मातंग कौन था?
उत्तर:
मातंग:
मातंग बोधिसत्व थे जिन्होंने एक चांडाल के घर जन्म लिया था। उनका विवाह एक व्यापारी की पुत्री दिथ्थ से हुआ था।
उनके यहाँ एक पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम माडव्य कुमार था। मांडव्य बड़ा होने पर तीन वेदों का ज्ञाता बना।
वह प्रतिदिन 16 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराता था।
एक दिन जब उसका पिता (मातंग) फटे-पुराने कपड़ों में उसके द्वार पर आया। उसने भोजन माँगा लेकिन मांडव्य कुमार ने उसे पतित कहकर भोजन नहीं दिया।
इस घटना का पता जब उसकी माँ दिथ्थ को चला तो मातंग से माफी मांगने के लिए वह स्वयं वहाँ आई और पत्नी धर्म का निर्वाह किया।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर
प्रश्न 1.
वैदिकोत्तर काल की वर्ण व्यवस्था का वर्णन करें। उस व्यवस्था में शद्रों का क्या स्थान था?
>>>उत्तर:
वैदिकोत्तर काल की वर्ण व्यवस्था:
इस काल में जाति-प्रथा और दृढ़ हो गई। जन्म के आधार पर जातियाँ निश्चित होने लगीं। जैन और बौद्ध धर्म ने जाति-प्रथा का बड़ा विरोध किया परंतु तत्कालीन समाज में जाति-प्रथा प्रचलित थी। उस समय समाज चार वर्गों में बंटा हुआ थाः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। अब धर्मसूत्रों ने प्रत्येक वर्ण के कर्मों को निर्धारित कर दिया था।
दीवानी एवं फौजदारी कानून का आधार भी अब वर्ण-व्यवस्था ही बन गई थी। जो व्यक्ति जितने ऊँचे वर्ण से सम्बन्धित होता था। उससे उतने अधिक ऊँचे नैतिक आचरण की अपेक्षा की जाती थी। धीरे-धीरे शूद्रों पर अनेक निर्योग्यतायें थोप दी गई। इन्हें विभिन्न कानूनों तथा धार्मिक अधिकारों से वंचित कर दिया गया और सबसे निचले स्थान पर फेक दिया गया।
परंतु धीरे-धीरे जैन और बौद्ध धर्म के प्रचार के कारण ब्राह्मणों का प्रभुत्व कम हुआ और क्षत्रियों को प्रधानता प्राप्त हुई। वैश्य लोग बड़े धनी होने लगे परंतु शूद्रों की दशा और भी शोचनीय होती गई। बौद्ध साहित्य में-चाण्डालों का भी उल्लेख है। नगर-सीमा से बाहर निवास करने वाले इन चाण्डालों के स्पर्श-मात्र से अन्य लोग डरते थे। समाज में दास भी थे । वे गृह-कार्य करते थे परंतु उनके साथ अछूतों जैसा व्यवहार नहीं किया जाता था।
जैन और बौद्ध धर्म के प्रभाव के कारण ब्राह्मण धर्म की आश्रम-प्रणाली काफी शिथिल हो गई थी ! सन्यास और ताप के स्थान पर शुद्ध तथा पवित्र जीवन और आचरण पर अधिक बल दिया जाने लगा। इस काल में भी संयुक्त परिवार प्रथा प्रचलित थी।
यद्यपि समाज में स्त्रियों का सम्मान था, परंतु वैदिक काल की अपेक्षा उनकी दशा अब गिर चुकी थी। महात्मा बुद्ध ने भी संघ में स्त्रियों का प्रवेश निषिद्ध किया था। इतना अवश्य है कि स्त्रियों के साथ आदर का व्यवहार किया जाता था। उन्हें उचित शिक्षा देने का प्रबंध किया जाता था। समाज में पर्दा-प्रथा नहीं थी। स्त्रियों को धार्मिक और सामाजिक कार्यों में भाग लेने की स्वतंत्रता थी। वे मेलों और उत्सवों में शामिल होती थीं।
उत्तर-पश्चिमी भारत में सती-प्रथा प्रचलित हो चुकी थी। समाज में वेश्यायें भी होती थी। आम्रपाली इस युग की वैशाली की प्रसिद्ध वेश्या (नगरवधू) थी। साधारण व्यक्ति एक ही स्त्री से विवाह करते थे, परंतु राजपरिवारों और धनिकों में बहुविवाह प्रथा भी प्रचलित थी। बाल विवाह प्रथा नहीं थी। लड़के-लड़कियों के विवाह माता पिता द्वारा निश्चित किये जाते थे। राजकुमारियों के विवाह स्वयंवर प्रथा से होते थे।
प्रश्न 2.
आरम्भिक समाज के आर्थिक एवं धार्मिक जीवन का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
1. आरम्भिक समाज का आर्थिक जीवन:
(I) कृषि:
लोग ग्रामों में रहते थे और उनका मुख्य धंधा खेती था। कपास, गेहूँ, चावल तथा सब्जियों की उपज अधिक होती थी। अधिक वर्षा और सूखा-ये किसान के दो सबसे बड़े शत्रु थे। खेती के ढंगों में अब थोड़ी-सी उन्नति हो चुकी थी और सिंचाई अब छोटे-छोटे नालों द्वारा भी की जाती थी। हल अब पहले से बड़ा और भारी बनाया जाने लगा। कई बार हल खींचने के लिए 12 बैल जोते जाते थे। खाद के लिए गोबर का प्रयोग भी होने लगा।
(II) पशुपालन:
खेती-बाड़ी के पश्चात् पशुपालन लोगों का दूसरा बड़ा धंधा था।
(III) व्यापार:
व्यापार लोगों का एक अन्य मुख्य व्यवसाय था। अब व्यापारियों कई संघों में संगठित हो गए। ये संघ व्यापारियों के हितों की हर प्रकार से रक्षा करने में सक्रिय रहते थे। कई नए सिक्के-निष्क, शतमान और कर्षमाण आदि प्रचलित हो चुके थे।
(IV) नगरों का उदय:
ऋग्वैदिक काल में लोग प्राय: छोटे-छोटे गाँवों में रहते थे और वहीं अनेक प्रकार के काम-धन्धे करके अपना निर्वाह करते थे। अब अयोध्या हस्तिनापुर, मथुरा तथा इन्द्रप्रस्थ जैसे कई नगरों की स्थापना हो चुकी थी।
2. धार्मिक जीवन (Religious Life):
(I) नए देवताओं का उदय:
ऋग्वैदिक काल के इन्द्र, वरुण, सूर्य, पृथ्वी तथा अग्नि जैसे प्राकृतिक देवताओं के स्थान पर अब ब्रह्मण, विष्णु, शिव, गणेश, पार्वती, राम और कृष्ण जैसे नए देवताओं की पूजा आरंभ हो चुकी थी।
(II) धर्म में पेंचीदगी का समावेश:
अब धर्म वैदिक काल की भांति सरल नहीं रहा। उसमें दिन-प्रतिदिन नए-नए रीति-रिवाज और संस्कार प्रवेश करते जा रहे थे। बलिदान की ओर लोगों का झुकाव बहुत बढ़ गया था। इस प्रकार धर्म इतना पेंचीदा हो गया था कि जन-साधारण के लिए उसको समझ पाना बहुत कठिन हो रहा था।
(III) जादू टोने में विश्वास:
लोग अपने शत्रुओं को नष्ट करने तथा बीमारी को दूर करने के लिए जाद्-टोने का आश्रय लेने लगे थे।
(IV) मुक्ति, माया, पुनर्जन्म और कर्म सिद्धांत में विश्वास:
लोगों को यह ज्ञान हो चुका था कि संसार एक मायाजाल है, इसलिए इससे निकलकर उन्हें मुक्ति की ओर अग्रसर होना चाहिए। अगला जन्म अच्छा मिलने के लिए सत्कर्म करने की जानकारी भी लोगों को हो चुकी थी।
प्रश्न 3.
अस्पृश्य कौन लोग थे? इनके क्या कर्त्तव्य थे?
>>>उत्तर:
अस्पृश्य लोग:
भारतीय समाज में ब्राह्मणों ने कुछ लोगों को सामाजिक व्यवस्था से अलग रखा था। इन्हें ‘अस्पृश्य’ घोषित कर सामाजिक विषमता को और अधिक बढ़ावा दिया। ब्राह्मणों का यह निर्देश था कि अनुष्ठान संपन्न करने वाले लोग अस्पृश्यों के यहाँ भोजन न करें।
=”font-size: 12pt;”>अनुष्ठान न करने वाले और शवों की अंत्येष्टि तथा मृत जानवरों को छूने वालों को ‘चाण्डाल’ कहा जाता था। उन्हें वर्ण व्यवस्था वाले समाज में सबसे निम्न कोटि में रखा जाता था। उच्च वर्ग के लोग चाण्डालों को स्पर्श करना तो दूर कि उन्हें देखना भी अशुभ समझते थे।
चांडालों के कर्तव्य:
मनुस्मृति में चांडालों के कर्तव्य निम्नवत् दिए गए हैं –
उन्हें गाँव से बाहर रहना पड़ेगा।
उन्हें जल्लाद के रूप में कार्य करना होगा।
उन्हें उन मुर्दो की अन्त्येष्टि करनी होगी जिनका कोई सगा-सम्बन्धी न हो।
वे उच्छिष्ट बर्तनों में भोजन करेंगे और मृत लोगों के वस्त्र तथा लोहे के आभूषण पहनेंगे।
वे गाँव और नगरों में रात को स्वछंदता से नहीं घूमेंगे।
रास्ते में चलते समय उन्हें डंडा बजाते हुए चलना होगा ताकि आवाज सुनकर लोग मार्ग छोड़ दें।
<span class=”yoast-text-mark”>=”font-size: 12pt;”>चांडालों का वर्णन अन्यत्र भी मिलता है। पाँचवीं शताब्दी के चीनी यात्री फाह्यान ने लिखा है कि लोग चांडालों को घृणा की दृष्टि से देखते हैं तथा जब कभी वे नगर में प्रवेश करते हैं तो लाठी को भूमि पर टकराते हुए आगे बढ़ते हैं ताकि लोगों को उनके आने का पता चल जाए। 7 वीं शताब्दी में भारत यात्रा करने वाले वेनसांग ने लिखा है कि जल्लाद तथा चमड़ा रंगने वालों को नगर के बाहर रहना पड़ता था।
=”font-size: 12pt;”>ब्राह्मण ग्रंथों में भी चांडालों के जीवन की दुर्दशा का वर्णन है। पाली ग्रंथ मलेगा जातक के अनुसार पिछले जीवन में गौतम बुद्ध एक चाण्डाल के पुत्र मतंग थे। अनेक कठिनाइयों का सामना करने के पश्चात् उन्होंने एक व्यापारी की पुत्री दिथ्थ से विवाह किया। उनका एक पुत्र माण्डव कुमार था। जैसे ही वह बड़ा हुआ, उसने वेदों का अध्ययन किया तथा प्रतिदिन 16 हजार ब्राह्मणों को भोजन करवाने लगा। इस पुत्र ने भी एक बार मतंग का अपमान किया था।
प्रश्न 4.
महाभारत की ऐतिहासिक प्रामाणिकता पर एक टिपण्णी लिखिए।
उत्तर:
महाभारत की ऐतिहासिक प्रामाणिकता:
महाभारत प्राचीन भारत का एक महाकाव्य और संस्कृत का प्रसिद्ध ग्रंथ है, परंतु इसकी ऐतिहासिकता को लेकर लोगों में विवाद है। कुछ विद्वानों का कहना है कि यह कृत्रिम महाकाव्य है और लेखन प्रणाली को नया रूप देने के लिए दो परिवारों की लड़ाई को कथा-वस्तु बनाया गया है।
=”font-size: 12pt;”>कुछ इतिहासकारों का कहना है कि महाभारत केवल एक उपन्यास है। इस उपन्यास को वेदव्यास ने लिखा है। कुछ लोगों का विचार है कि इतिहास में महाभारत जैसी कोई घटना नहीं हुई और यह केवल मिथ्या कहानी है। ऐसे तर्क रहने पर भी भारतीय परम्परा तथा महान् विद्वानों का दृढ़ विश्वास है कि महाभारत अनेक महत्त्वपूर्ण घटनायें का एक वृहत् इतिहास है।
तिथि:
प्रसिद्ध इतिहासकार पारजीटर ने परम्परागत इतिहास (Traditional History) के आधार पर महाभारत युद्ध की तिथि 950 सा०यु०पू० निर्धारित की है।
=”font-size: 12pt;”>डॉ० नीरद राय ने अपने शोध ग्रंथ में कौशाम्बी के स्तरीकरण के आधार पर महाभारत की तिथि 1100 सा०यु०पू० बताई है।
=”font-size: 12pt;”>पाँचवीं शताब्दी में प्राचीन भारत के एक महान् गणितज्ञ तथा खगोलशास्त्री ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘आर्यभट्ट’ में खगोल शास्त्र के सिद्धांतों का आधार लेकर महाभारत का अध्ययन किया। महाभारत में वर्णित ग्रह स्थिति के अनुसार आर्यभट्ट ने इसकी अनुमानित तिथि 3100 सा०यु०पू० निर्धारित की है।
=”font-size: 12pt;”>ऐतिहासिकता:
सौभाग्यवश कई वैदिक और पौराणिक रचनाएँ ज्योतिष के आधार पर यह प्रमाणित करती है कि महाभारत एक वास्तविक घटना है। डॉ० प्रशान्त गोखले का कहना है कि महाभारत केवल एक कहानी नहीं बल्कि प्राचीनकाल में घटित घटनाओं का विवरण है। इस सम्बन्ध में उन्होंने कई प्रमाण दिये हैं जो निम्नलिखित हैं:
=”font-size: 12pt;”>1. ऋषि वेदव्यास ने इस युद्ध के आरंभ होने से पूर्व ही इतिहास लिखने का मन बना लिया था। युद्ध के दौरान उन्होंने इसकी प्रत्येक प्रकार की विस्तृत जानकारी लिपिबद्ध की। यदि यह केवल एक उपन्यास होता तो वेदव्यास जैसा महान् विद्वान इस युद्ध की इतनी छोटी-छोटी तथा अनावश्यक घटनाओं का वर्णन क्यों करता।
=”font-size: 12pt;”>2. काव्यात्मक स्वरूप होने के कारण मात्र से महाभारत को इतिहास न मानना एक भारी भूल है। उल्लेखनीय है कि प्राचीन काल में सभी साहित्यिक रचनाएँ पद्य या काव्यात्मक ‘स्वरूप की थी।
=”font-size: 12pt;”>3. महाभारत में कई स्थानों पर लिखा है कि इतिहास का एकमात्र अर्थ है-“यह ऐसा हुआ” प्राचीन काल की घटनाओं तथा कुछ समय पूर्व बीती घटनाओं को अलग-अलग करने के लिए आर्यों ने पुराण तथा इतिहास शब्दों का प्रयोग किया परंतु इन दोनों शब्दों का यह अर्थ है कि यह ऐतिहासिक घटनायें भिन्न-भिन्न समय पर घटित हुई।
=”font-size: 12pt;”>4. उस काल में राजाओं की वंशावलियों की क्रमवार जानकारी लिखी जाती थी। एक चीनी यात्री के विवरण से इसकी पुष्टि होती है। महाभारत एक ऐसे युद्ध की गाथा है जो कि वास्तव में हुआ और इसमें राजाओं की वंशावलियों का पूर्ण वर्णन है।
<span class=”yoast-text-mark”>=”font-size: 12pt;”>5. भारत के अघपर्व तथा भीष्मपर्व खण्डों में लिखा है कि यह एक इतिहास है। यदि इसके लेखक की भावना एक उपन्यास या कविता लिखने की होती तो वह इसको महाकाव्य या कथा का नाम न देता।</h6>
=”font-size: 12pt;”>6. महाभारत तथा भागवत् जैसे अन्य धार्मिक ग्रंथों में उस समय के नक्षत्रों तथा उपग्रहों की स्थिति के बारे में ठीक-ठीक जानकारी दी गयी है। एक उपन्यास में खगोलशास्त्र का प्रयोग करके नक्षत्रों की स्थिति की जानकारी कदापि नहीं दी जा सकती है।
=”font-size: 12pt;”>7. महाभारत में बहुत से वंशों तथा उसके शासकों का वर्णन है । राजा भरत से लेकर राजा मांडु तक 50 से अधिक राजाओं के इतिहास का वर्णन है। इसके अतिरिक्त राजा, उसकी पत्नी, उसकी संतान, उसके संबंधियों आदि का विस्तारपूर्वक वर्णन है। यदि यह केवल एक उपन्यास होता तो कहानी का निर्माण करने के लिए केवल 4-5 राजाओं का नाम देना पर्याप्त था तथा उसमें विस्तृत वृत्तांत देने की आवश्यकता न रहती।
=”font-size: 12pt;”>8. महाभारत में द्वारिका का वर्णन है जिसके अवशेष समुद्र में मिले हैं। ऐसा माना जाता है कि द्वारिका नगर 2000-3000 सा०यु०पू० समुद्र में डूब गया था।
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