Class 12th history chapter 2 subjective question answer
लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Type Questions)
1. अशोक के धम्म पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
अशोक ने अपनी प्रजा के नैतिक उत्थान के लिये कुछ सिद्धान्त बनाये; इन सिद्धान्तों को अशोक का धम्म कहा जाता है। अशोक का घम्म सभी धर्मों का सार संक्षेप था। अशोक के अभिलेख संख्या दो और पांच के अनुसार-कम पाप, बहुत कल्याण, दया और दान ही धम्म है।
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2. मौर्यकालीन इतिहास के प्रमुख स्रोतों का संक्षिप्त विवरण दें।
मौर्यकालीन इतिहास जानने के निम्नलिखित प्रमुख स्रोत हैं
(1) साहित्यिक स्त्रोत- साहित्यिक स्रोतों में कौटिल्य का अर्थशास्त्र, विशाखदत्त का मुद्राराक्षस, कालिदास के नाटक, बौद्ध साहित्य में दीपवंश, महावंश, मिलिन्दपन्हो, दिव्यावदान, मजुश्रीमुलकल्प एवं जैन साहित्य में भद्रवाहुचरित्र एवं परिशिष्ट पर्वत प्रमुख हैं।
(ii) पुरातात्विक स्त्रोत- पुरातात्विक स्रोतों में अशोक के अभिलेख, पाटलीपुत्र के राजदरबार का ध्वंशावशेष, सिक्के और विभिन्न प्रकार के औजार प्रमुख हैं।
(iii) विदेशी यात्रियों के विवरण- फाह्यान और ह्वेनसांग के विवरणों से भी मौर्यकाल के विषय में जानकारियाँ मिलती हैं। तिब्बती लेखक लामा तारनाथ की रचनाओं में भी मौर्यवंश पर प्रकाश पड़ता है।
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3. चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य की उपलब्धियों का वर्णन करें।
समुद्रगुप्त के बाद उसका पुत्र चन्द्रगुप्त द्वितीय सिंहासन पर बैठा। उसने विक्रमादित्य की उपाधि धारण किया। उसने गुप्त साम्राज्य को सुदृढ़ बनाया और उसमें मालवा गुजरात और काठियावाद शामिल किए। उसने अपनी बेटी प्रभावती गुप्त का विवाह मध्य दक्कन के वाकाटक वंश के शासक रूद्रसेन द्वितीय के साथ किया। इस वैवाहिक संबंध से चन्द्रगुप्त को अपनी समस्त सेना को शकों के विरुद्ध इकट्ठी करने का अवसर मिल गया। उसके शासन काल में कला, साहित्य और विज्ञान का अभूतपूर्व विकास हुआ। कला साहित्य की प्रगति को देखते हुए इतिहासकारों ने उसके काल को स्वर्णकाल कहा है।
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4. सातवाहन कौन थे?
दक्कन भारत में ई०पू० प्रथम शताब्दी में सिमुक नामक व्यक्ति ने सातवाहन वंश की स्थापना की थी। इस वंश का सबसे शक्तिशाली शासक गौतमीपुत्र शतकर्णी था। इसके शासक ब्राह्मण थे। यह एक मातृसत्तात्मक राजवंश था। इसी के काल में सर्वप्रथम ब्राह्मणों को भूमि दान की परंपरा शुरू हुई थी।
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5. मौर्यकालीन इतिहास के चार अभिलेखिए स्रोत को लिखें।
मौर्यकालीन इतिहास के चार अभिलेखिए स्रोत निम्नलिखित हैं :
(i) वृहत शिलालेख जो कलसी, शहबाजगढ़ी आदि से मिले हैं।
(ii) मास्की, गुर्जरा से प्राप्त लघु शिलालेख
(iii) गिरनार से प्राप्त लघु शिलालेख
(iv) लौरिया, अरेराज से प्राप्त स्तंभ अभिलेख ।
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6. मौर्यकालीन कला एवं स्थापत्य का वर्णन करें।
मौर्यकालीन कला एवं स्थापत्य का सर्वश्रेष्ठ नमूना इस समय के स्तम्भएवं यक्षिणी की मूर्ति है। साँची, सारनाथ आदि जगहों पर मौर्यकालीन स्तूप मिले हैं। इस समय मूर्ति निर्माण में गांधार एवं मथुरा शैली का विकास हुआ। अशोक द्वारा 84 हजार बौद्ध स्तूपों तथा विहार का निर्माण करवाया गया था। इस काल में पर्वतों को काटकर गुहा गृहों का भी निर्माण हुआ। बराबर की पहाड़ियों एवं नागार्जुनी पहाड़ियों में आज भी हैं।
7. महाजनपद से आप क्या समझते हैं?
उत्तर-वैदिक काल में जिस क्षेत्रीय राज्यों के उदय की प्रक्रिया आरम्भ हुई थी वह छठी सदी ई० पू० तक आते-आते बड़े राज्यों में बदल गई। इन्हीं प्रभुता सम्पन्न राज्य को महाजनपद कहा गया है। बौद्ध ग्रन्थ अंगुतर निकाय के अनुसार 16 महाजनपद थे जो निम्नलिखित हैं (i) काशी (ii) कोशल (iii) अंग (iv) मगध (v) वज्जि (vi) मल्ल (vii) चेदि (viii) वत्स (ix) कुरू (x) पांचाल (xi) मत्स्य (xii) शूरसेन (xiii) अश्मक (xiv) अवन्ति (xv) गांधार (xvi) कम्बोज। इन महाजनपदों में वज्जि और मल्ल गणराज्य थे और शेष में राजतंत्रात्मक प्रणाली प्रचलित थी। इन महाजनपदों में सबसे शक्तिशाली मगध था
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8. गुप्तकालीन विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी पर प्रकाश डालें।
गुप्त काल में विज्ञान और प्रौद्योगिकी की विभिन्न शाखाओं का उल्लेखनीय विकास हुआ। गणित के क्षेत्र में आर्यभट्ट की रचना आर्यभट्टीयम सर्वप्रमुख है। इसमें अंकगणित, बीजगणित, तथा रेखागणित की विवेचना है। शून्य का आविष्कार एवं पाई (π) का मान 3.14 इन्होंने ही बताया। ज्योतिष के क्षेत्र में पृथ्वी गोल है, सूर्यग्रहण एवं चंद्रग्रहण आदि की जानकारी दी गई है। वराहमिहिर की रचना पंच सिद्धांतिक इसी समय की रचना है। आयुर्विज्ञान के क्षेत्र में चरक एवं सुश्रुत इसी समय हुए थे। नागार्जुन रसायन और धातु विज्ञान के प्रमुख ज्ञाता थे।
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9. अशोक के अभिलेखों पर टिप्पणी लिखें।
अशोक के 40 से अधिक अभिलेख प्राप्त हुये हैं। इन अभिलेखों का भारत के इतिहास में बड़ा महत्त्व है-
(i) अशोक के अधिकतर अभिलेख सीमान्त क्षेत्रों में है इसकी सहायता से हम अशोक के साम्राज्य की सीमाएँ निश्चित कर सकते हैं।
(ii) उसके अभिलेखों से यह स्पष्ट होता है कि वह बौद्ध धर्मावलम्बी था।
अशोक के अभिलेखों से उसके उच्च चारित्रिक विशेषताओं की जानकारी मिलती है। (iii)
(iv) इन अभिलेखों से ज्ञात होता है कि अशोक के मिस्र, सीरिया, वर्मा और श्रीलंका के साथ बड़े अच्छे संबंध थे।
(v) इन अभिलेखों से यह भी ज्ञात होता है कि अशोक ने बौद्ध धर्म का प्रचार करने के लिए कौन-कौन से साधन अपनाये।
(vi) अशोक के अभिलेखों से मौर्यकालीन कला का ज्ञान होता है।
10. कलिंग युद्ध का अशोक पर क्या प्रभाव पड़ा?
कलिंग युद्ध का अशोक पर निम्न प्रभाव पड़ाः
(i) अशोक ने साम्राज्य विस्तार की नीति का परित्याग कर दिया।
(ii) इसने अहिंसा, सत्य, प्रेम, दान, परोपकार आदि का रास्ता अपनाया।
11. समुद्रगुप्त की नेपोलियन से तुलना क्यों की जाती है? दो कारण बताएँ।
12. हर्यक वंश का संस्थापक कौन था? उसका कार्यकाल बतायें।
हर्यक वंश का संस्थापक राजा विम्बिसार था। जैन साहित्य में इसका नाम श्रेणिक कहा गया है। इसका कार्यकाल 544-492 ई०पू० था। इसी के राज में महान राजवैद्य जीवक था। विविसार के पुत्र अजातशत्रु ने इसे बंदी बनाकर कारागार में डाल दिया था।
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13. मौर्यकालीन इतिहास के किन्हीं दो प्रमुख साहित्यिक स्रोतों के नाम बतायें।
साहित्यिक स्रोतों में कौटिल्य का अर्थशास्त्र, विशाखदत्त का मुद्राराक्षस, कालिदास के नाटक, बौद्ध साहित्य में दीपवंश, महावंश, मिलिन्दपन्हो, दिव्यावदान, मजुश्रीमुलकल्प एवं जैन साहित्य में भद्रवाहुचरित्र एवं परिशिष्ट पर्वत प्रमुख हैं।
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14. किन्हीं दो गुप्तकालीन मंदिरों के नाम एवं स्थान को लिखें।
अथवा, गुप्त काल के दो प्रसिद्ध मंदिरों के नाम बताइए।
गुप्तकालीन दो मंदिरों के नाम एवं स्थान निम्न हैं:
(i) देवगढ़ के दशावतार मंदिर- यह वैष्णव धर्म से संबंधित सबसे महत्वपूर्ण मंदिर है।
(ii) भूमरा का शिव मंदिर- यह शैव धर्म से संबंधित सबसे महत्वपूर्ण मंदिर है।
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15. पाटलिपुत्र नगर की स्थापना किसने और कब की थी?
पाटलिपुत्र नगर की स्थापना उदयिन ने पाँचवी सदी ई०पू० में किया था। इसने अपनी राजधानी राजगृह (गिरिव्रज) से पाटलिपुत्र स्थानांतरित किया था।
16. गुप्तकाल के दो अभिलेखों के नाम लिखिए।’
गुप्तकाल के दो प्रमुख अभिलेख हैं-
(i) प्रयाग प्रशस्ति : हरिषेण द्वारा निर्मित इस प्रशस्ति में समुद्रगुप्त के सैनिक अभियानों, विजय आदि का विवरण है।
स्तूप कास वाया हुआ।
(ii) मेहरौली का लौह-स्तम्भ।
17. किन्हीं चार महाजनपदों के नाम लिखें।
प्राचीन भारत में चार प्रमुख महाजनपद थे (1) मगध, (2) कोशल, (3) वत्स और (4) अवंती। ये महाजनपदं राजनीतिक और आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण थे। मगध को विशेष रूप से उसकी शक्ति और समृद्धि के लिए जाना जाता था, जबकि कोशल और वत्स व्यापार और संस्कृति के केंद्र थे। अवंती भी एक महत्वपूर्ण महाजनपद था, जो व्यापारिक गतिविधियो के लिए प्रसिद्ध था।
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18. वर्ण व्यवस्था से आप क्या समझते हैं?
वैदिक काल में समाज को चार वर्गों में बाँटा गया था- ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य और शूद्र। ऋग्वैदिक काल में यह वर्गीकरण कार्य (कर्म) के आधा पर था, लेकिन उत्तर वैदिक काल में यह जन्म के आधार पर तय हो लगा। ऋग्वेद के दसवें मंडल के पुरुष सूक्त में पहली बार इन चार व का उल्लेख मिलता है।
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19. स्त्रीधन क्या होता था?
वह धन जो किसी स्त्री को उसके माता-पिता, पति, भाई, मामा या रिश्तेद से प्रेम और स्नेहपूर्वक दिया जाता था, उसे स्त्रीधन कहते थे। विवाह समय भी वधु को दिया गया उपहार स्त्रीधन कहलाता था। इस धन केवल स्त्री का अधिकार होता था और उसकी संतान इसे विरासत में सकती थी।
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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Type Questions)
1. मौर्य प्रशासन की जानकारी दें।
1. मौर्य शासन-व्यवस्था का उद्देश्य राज्य को स्थायित्व प्रदान करना, अधिक से अधिक कर वसूलना एवं लोक-कल्याणकारी कार्य करना था। मौर्य शासन पद्धति की व्याख्या संक्षेप में इस प्रकार की जा सकती है-
(i) सम्म्राट-मौर्य शासन-व्यवस्था का केन्द्र बिन्दु सम्राट था। किन्तु वह निरंकुश शासक के रूप में कार्य नहीं करता था, उसे प्रजा की इच्छा का सदैव ध्यान रखना पड़ता था।
(ii) मंत्री-परिषद- राजा को परामर्श देने के लिए एक मंत्री परिषद भी थे । इनकी संख्या 12 से 15 तक होती थी। राज्य के महत्त्वपूर्ण एवं आवश्यक कार्यों में परामर्श के लिए सम्राट इनकी बैठक बुलाता था और सामान्यतः राजा इनके परामर्श के अनुरूप ही कार्य करता था।
(iii) पदाधिकारी- शासन को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए बड़ी संख्या में पदाधिकारियों की नियुक्ति की गई थी। ‘आमात्य’ नाम के पदाधिकारियों का विशेष महत्त्व था। इसके अतिरिक्त समाहर्ता, सन्निधाता, सेनापति, दुर्गपाल, व्यावहारिक, प्रदेष्टा, दौवारिक आदि महत्त्वपूर्ण पदाधिकारी थे।
(iv) न्याय व्यवस्था- न्याय के मामलों में राजा सर्वोच्च अधिकारी था। किसी भी मामलों की अन्तिम अपील राजा के पास होती थी। ग्राम में न्याय का कार्य ग्राम पंचायत करती थी। न्याय के लिये दो प्रकार के न्यायालय स्थापित किये गये थे- (i) धर्मस्थीय न्यायालय (ii) कंटक शोधन न्यायालय।
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2. चन्द्रगुप्त मौर्य की जीवनी एवं उपलब्धियों की विवेचना करें।
.चन्द्रगुप्त मौर्य, मौर्य साम्राज्य का संस्थापक और इस वंश का महानत्तम शासक था। चन्द्रगुप्त अपने गुरु चाणक्य की सहायता से नंद वंश का नाश करके मौर्य वंश की स्थापना किया था। उसका साम्राज्य विस्तार उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में आधुनिक कर्नाटक तक तथा पूर्व में बंगाल से लेकर पश्चिम में काठियावाड़ तक विस्तृत था। उसके द्वारा स्थापित शासन व्यवस्था पूरे मौर्यकाल और उसके बाद के शासकों द्वारा अपनाया गया। उसके शासन व्यवस्था का संक्षेप में वर्णन इस प्रकार हैं-
(1) सम्राट मौर्य शासन व्यवस्था का केन्द्र विन्दु सम्राट स्वयं चंद्रगुप्त था। शासन अतिकेन्द्रीकृत था परन्तु निरंकुश नहीं था, प्रजा के हीतों को ध्यान में रखकर ही शासन चलाया जाता था।
(II) मंत्रीपरिषद चन्द्रगुप्त को शासन कार्य में सहायता करने के लिए एक मंत्रीपरिषद भी थी। चन्द्रगुप्त सभी महत्त्वपूर्ण विषयों पर मंत्रीपरिषद के सदस्यों से परामर्श करता था।
(iii) पदाधिकारी शासन को सूचारु रूप से संचालन के लिए बड़ी संख्या में पदाधिकारियों की नियुक्ति की गई थी। अमात्य नाम के पदाधिकारियों का विशेष महत्त्व था। इसके अतिरिक्त समाहर्ता, सन्निधाता, सेनापति, दूर्गपाल, प्रदेष्टा इत्यादि महत्त्वपूर्ण पदाधिकारी थे।
(iv) न्याय व्यवस्था न्याय के मामले में चन्द्रगुप्त स्वयं सर्वोच्च अधिकारी था। किसी भी मामले की अंतिम सुनवाई सम्म्राट के पास ही होता था। न्याय के लिए दो प्रकार के न्यायालय स्थापित किये गये थे (i) धर्मस्थीय (ii) कंटक शोधन। ग्राम में न्याय का कार्य ग्राम पंचायत करती थी। दंड व्यवस्था कठोर थी। जुर्माने से लेकर प्राणदण्ड का
प्रावधान था।
(v) सैन्य व्यवस्था-चन्द्रगुप्त मौर्य ने एक विशाल सेना का संगठन किया था, जो पाँच भागों में विभक्त थी। पैदल, अश्वारोही, रथ सेना, गजारोही और नौसेना। इसके अलावे गुप्तचर विभाग भी था, जो दुश्मनों की सैन्य गतिविधियों पर पैनी नजर रखता था।
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3. क्या गुप्तकाल प्राचीन भारत का ‘स्वर्ण युग’ था?
अथवा, गुप्तकाल को ‘भारत का स्वर्ण युग’ क्यों कहा जाता है?
गुप्तकाल सांस्कृतिक विकास के दृष्टिकोण से भारतीय इतिहास में विशेष महत्त्व रखता है। इस काल में समाज धर्म, कला, स्थापत्य, शिक्षा, साहित्य एवं दर्शन के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हुई। इसलिए गुप्तकाल को सांस्कृतिक प्रस्फूटन का काल कहा जाता है। सांस्कृतिक विकास की जानकारी तत्कालीन साहित्यिक एवं पुरातात्विक स्रोतों में प्रचुरता में मिलती है, जिनका संक्षेप में वर्णन इस प्रकार हैं
(i) सामाजिक व्यवस्था- समाज में चार प्रमुख वणाँ (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र) के अतिरिक्त अनेक जातियाँ एवं उपजातियाँ भी थीं। सामान्यतः वर्ण और जाति व्यवस्था के नियम कड़े थे, परन्तु संकट काल में निर्धारित व्यवसाय को छोड़कर दूसरा व्यवसाय अपनाने की भी अनुमति स्मृतिकारों ने दी। इससे समाज में कुछ लचीलापन आया।
(ii) धार्मिक स्थिति-गुप्तकाल धार्मिक दृष्टिकोण से ब्राह्मण धर्म के पुनरुत्थान का युग था। इस समय ब्राह्मण धर्म की प्रतिष्ठा स्थापित हुई।
(iii) स्थापत्य कला का विकास स्थापत्य कला के क्षेत्र में मंदिरों का निर्माण सबसे महत्त्वपूर्ण है। गुप्तकाल में मंदिर निर्माण आरंभहुआ। विभिन्न देवताओं के लिए भव्य मंदिर बनाए गए। इन मंदिरों
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4. मगध साम्राज्य के उत्थान के क्या कारण थे?
मगध साम्राज्य का उत्थान प्राचीन भारतीय इतिहास की महत्त्वपूर्ण घटनाओं में से एक है। मगध के उत्थान के लिए निम्नलिखित कारक उत्तरदायी थे (1) आर्थिक स्थिति-मगध के उत्थान में आर्थिक कारणों का महत्त्वपूर्ण
योगदान रहा है। प्रकृति ने मगध को मुक्तहस्त से वरदान दिया था यहाँ की भूमि उर्वर थी और धान की खेती अच्छी होती थी। जहाँ धान की खेती अच्छी होती है वहाँ की जनसंख्या अधिक होती है। इस तरह मगध अन्य गणराज्यों पर भारी पड़ता था। मगध के पास घने जंगल थे जहाँ से इमारती लकड़ी प्राप्त होती थी साथ ही लोहे के खान भी थे जिससे उन्नत किस्म के अस्त्र-शस्त्र बनाये जाते थे। गंगा और उसके उपनदियों के समीप होने के चलते व्यापार-वाणिज्य भी काफी विकसित अवस्था में था। साथ ही जंगलों में हाथी मिलती थी। जो उस समय सेना के अग्रिम पंक्ति में होता था।
(ii) भौगोलिक कारण मगध की राजधानी गंगा, सोन और गंडक नदियों के संगम पर जलदूर्ग के समान बसा था और यह दुश्मनों के आक्रमण से सुरक्षित था। मगध की पहली राजधानी राजगृह सात पहाड़ियों से घिरा हुआ था। यह भी दुश्मनों के आक्रमण से सुरक्षित था। अतः शत्रुओं के आक्रमण के भय से निश्चित होकर मगधवासी एवं शासकगण अपनी पूरी क्षमताओं और साधनों को मगध की उन्नति और प्रगति में निरन्तर लगा सके।
(iii) प्रतापी राजाओं का योगदान मगध के पास एक से बढ़कर एक महाबली योद्धा थे जैसे बिम्बिसार, अजातशत्रु, महापद्मनन्द, चन्द्रगुप्त आदि। इन महान साम्राज्यवादी शासकों ने मगध के उत्थान में महत्त्वपूर्ण योगदान किया। दूसरे अन्य गणराज्यों के पास ऐसा नहीं था। इसलिए मगध का उत्थान संभव हो सका।
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5. मौर्य साम्राज्य के नगर प्रशासन पर प्रकाश डालें।
मेगास्थनीज ने मौर्यकालीन नगर प्रशासन का सबसे विस्तृत एवं विशद वर्णन किया है। उनके अनुसार नगर का शासन प्रबन्ध 30 सदस्यों की एक समिति के हाथ में था। यह समिति छः समितियों में विभक्त थी। प्रत्येक समिति में पाँच सदस्य होते थे, ये समितियाँ इस प्रकार थीं-
(i) शिल्पकला समिति इस समिति के लोग उद्योग-धन्धों का निरीक्षण
एवं प्रबंध करते थे।
(ii) जनगणना समिति यह समिति जन्म-मरण का लेखा रखती थी।
(iii) वाणिज्य समिति यह समिति नाप-तौल का निरीक्षण, क्रय-विक्रय
का निरीक्षण तथा प्रबंध करते थे।
(iv) उद्योग समिति- यह समिति उत्पादित वस्तुओं की देखभाल करती थी।
(v) कर समिति इस समिति का प्रमुख कार्य कर वसूल करना था।
(vi) विदेश यात्री समिति- यह समिति विदेशियों के रहने तथा भोजन आदि की व्यवस्था करती थी।
matric exam
